महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने शिवसेना यूबीटी के मुखिया उद्धव ठाकरे पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कुर्सी के लिए हिंदुत्व को छोड़ दिया है। बालासाहब के नाम के पहले हिंदू हृदय सम्राट की जगह जनाब बालासाहब लिखने लगे हैं। उन्होंने वोट जिहाद को लेकर कहा कि मुस्लिम मौलाना फतवा निकाल रहे हैं तो मैं भी फतवा निकालता हूं। हिंदू हमारे हाथ में महाराष्ट्र की सत्ता दें। सत्ता आने के 48 घंटों में मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतार दूंगा। कहा- मैंने होर्डिंग उर्दू में देखे हैं और उसमें बाला साहब के नाम के पहले हिंदू हृदय सम्राट की जगह जनाब बालासाहब ठाकरे लिखा है। हिंदू हृदय सम्राट के बजाय जनाब, आज बालासाहब रहते तो इनको फटके लगाते। शर्म नहीं आती आज उसी उद्धव ठाकरे की शिवसेना के बारे में एक मौलाना फतवा निकाल रहा है। ये लोग फतवा निकाल रहे हैं। यह फतवा निकाल रहे हैं कि सभी मुसलमानों को एक होना चाहिए और एक साथ एमवीए को वोट देने चाहिए। इस तरह का फतवा मस्जिदों से निकल रहा है।
हिंदुस्तान की सियासत सतरंगी है। रोज नए रंग दिखाती है। इसी का उदाहरण है हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदरसिंह सुक्खू के लिए रेडिसन होटल से लाए गए समोसे, जो चोरी हो गए। आखिर गए कहां? यह जांचने का जिम्मा सौंपा गया है सीआईडी को। एजेंसी ने भी जांच शुरू कर दी। अब बीजेपी सरकार पर कटाक्ष कर रही है। कहती है सरकार को प्रदेश की बुनियादी सुविधाओं से ज्यादा समोसे की चिंता है। मामला 21 अक्टूबर का है। सीआईडी दफ्तर में कार्यक्रम था। इसमें सीएम भी पहुंचे थे। यहां सीएम के लिए लाए गए केस और समोसे उनके स्टाफ ने आपस में बांट लिए। आयोजन के बाद खोजबीन हुई। सीआईडी ने जांच की। पता चला सिर्फ एसआई को ही पता था कि ये डिब्बे खास तौर पर सीएम सुक्खू के लिए थे। जब इन्हें महिला इंस्पेक्टर को सौंपा गया तो उन्होंने किसी वरिष्ठ अधिकारी से पुष्टि नहीं की। इन्हें नाश्ते के लिए जिम्मेदार मैकेनिकल ट्रांसपोर्ट (एमटी) सेक्शन को भेज दिया। इस गलती के कारण इन बक्सों को उनके उचित व्यक्ति तक पहुंचने से पहले कई हाथों इधर से उधर हुए। रिपोर्ट में कहा गया है कि समन्वय की यह कमी इस गलती का एक महत्वपूर्ण कारण थी। अब मामले में बीजेपी आक्रामक है। विधायक व मीडिया विभाग प्रभारी रणधीर शर्मा ने कहा- हिमाचल प्रदेश की जनता परेशान है। हंसी की बात तो यह है सरकार को मुख्यमंत्री के समोसे की चिंता है। ऐसा लगता है सरकार को किसी भी विकासात्मक कार्यों की चिंता नहीं है, केवल मात्र खानपान की चिंता है।
श्रीनगर, एजेंसी। जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र के पांचवें दिन भी सत्र शुरू होते ही आर्टिकल 370 मुद्दे पर हंगामा शुरू हो गया। इंजीनियर राशिद के भाई और अवामी इत्तेहाद पार्टी के विधायक खुर्शीद अहमद शेख को मार्शलों ने सदन से बाहर निकाला। सदन में बीजेपी लगातार आर्टिकल 370 के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का विरोध कर रही है। आज हंगामा शुरू होने के बाद पीडीपी के खिलाफ नारे लगाए गए। सत्र शुरू होते ही बीजेपी विधायक खड़े हो गए। पीडीपी और स्पीकर के खिलाफ नारेबाजी करते हुए विरोध प्रदर्शन करने लगे।
इंदौर। मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बीच बढ़ती तल्खी से इंदौर के भाजपा नेता भी हैरान-परेशान हैं। बताया जा रहा है कि तनातनी की शुरुआत जून से हुई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए अभियान ‘एक पेढ़ मां के लिए’ के तहत इंदौर ने 51 लाख पौधे रोपकर रिकॉर्ड बनाया था। इस रिकॉर्ड का पूरा श्रेय इंदौर से लेकर दिल्ली तक विजयवर्गीय को मिला। बस, यहीं से दोस्ती में खटास शुरू हो गई। सियासी समीक्षकों की मानें तो सीएम और विजयवर्गीय के बीच मतभेद अब मनभेद में बदलता जा रहा है, जिसका असर मालवा की सियासत से लेकर इंदौर के विकास तक पर पड़ेगा। इसकी शुरुआत 14 जुलाई से हुई थी। तब एक दिन में 11 लाख से ज्यादा पेड़ लगाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। इसके लिए गृहमंत्री अमित शाह ने विजयवर्गीय और उनकी टीम की तारीफ की। 28 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी ने भी अभियान को सराहा। बताया जा रहा है कि इस कार्यक्रम लिए जो राशि खर्च हुई, उसका बड़ा हिस्सा नगर निगम ने दिया… बाकी मप्र सरकार ने। इंदौर की विभिन्न संस्थाओं ने भी पैसा दिया। सामूहिक प्रयास से इंदौर ने रिकॉर्ड बनाया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सिर्फ अतिथि बनकर रह गए, जैसे- दूसरे थे। इंदौर से भोपाल तक होर्डिंगों पर छा गए कैलाश विजयवर्गीय। मीडिया मैनेजमेंट के चलते अखबारों से लेकर राष्ट्रीय चैनलों तक पर उन्हीं के इंटरव्यू चले। इसमें कोई शक नहीं है कि 22 जनवरी के राम मंदिर उद्घाटन के दौरान इंदौर में ऐतिहासिक आयोजन करा चुके विजयवर्गीय के लिए पौधारोपण अभियान किसी शक्ति प्रदर्शन से कम नहीं था। रिकॉर्ड बनने पर उनकी वाहवाही जरूर हुई, लेकिन यदि रिकॉर्ड न बनता तो ताने भी मिलते। यह भी सच है कि इसी कार्यक्रम से विजयवर्गीय को लेकर डॉ. मोहन यादव की बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी थी। आदत है बुरा मानना ! कहा जा रहा है कि विजयवर्गीय खुद को प्रदेश का सबसे बड़ा नेता मानते हैं और उन्हें दूसरा भाता नहीं है। पहले उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और शिवराजसिंह चौहान की मुखालफत की। पार्टी ने दोनों बदल दिए। डॉ. मोहन यादव को कमान सौंपी। यहां भी सीनियर-जूनियर वाला मनभेद बना रहा। इंदौर में ऐसे नेताओं की लिस्ट लम्बी है, जो विजयवर्गीय को नहीं सुहाते। हाउसिंग बोर्ड गए ही नहीं विजयवर्गीय नगरीय प्रशासन एवं आवास मंत्री हैं। भोपाल में पर्यावास भवन में आॅफिस है, जहां इंदौर में निगमायुक्त और कलेक्टर रहते अपना जलवा बिखेर चुके मनीष सिंह आयुक्त के रूप में बैठते हैं। बगल में भव्य आॅफिस है, जहां विजयवर्गीय सिंह के आने के बाद गए ही नहीं।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 5 नवंबर को राज्य के सभी थाना परिसरों में मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दी। यह आदेश एक याचिका के आधार पर दिया गया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कई थानों में अवैध रूप से मंदिर बनाए जा रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक स्थलों के निर्माण पर रोक लगाई थी।
कोर्ट ने 19 नवंबर को मामले की अगली सुनवाई निर्धारित की है और राज्य सरकार के अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता ने यह आरोप लगाया कि अधिकारियों को इस निर्माण कार्य की जानकारी दी गई थी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जो धार्मिक स्थल पहले से बने हुए हैं, उनकी स्थिति रिपोर्ट पेश की जाए और नए निर्माण पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मंगलवार (5 नवंबर) को सभी थाना परिसरों में बन रहे मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दी। यह आदेश एक सरकारी कर्मचारी और अधिवक्ता ओम प्रकाश यादव द्वारा दायर याचिका के बाद आया, जिसमें सभी थाना परिसरों में मंदिरों के निर्माण पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने राज्य के सभी थानों में बन रहे मंदिरों पर रोक लगाने का आदेश दिया। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी। इसके अलावा, कोर्ट ने मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह विभाग, नगरीय प्रशासन, डीजीपी मध्य प्रदेश, कलेक्टर जबलपुर और पुलिस अधीक्षक जबलपुर सहित जिले के चार पुलिस थानों – सिविल लाइंस, विजय नगर, मदन महल और लार्डगंज को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही सार्वजनिक स्थलों पर मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा चुका है। इसके बावजूद कई थानों में मंदिरों का निर्माण जारी था। याचिका में उन थानों की तस्वीरें भी शामिल की गई हैं, जहां वर्तमान में मंदिरों का निर्माण किया जा रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सतीश वर्मा, अमित पटेल और ग्रीष्म जैन ने अपना पक्ष रखा।
याचिकाकर्ता ने लगाए आरोप याचिकाकर्ता के वकील सतीश वर्मा ने कहा कि अदालत ने मध्य प्रदेश के विभिन्न थानों में अवैध रूप से धार्मिक स्थल बनाने को लेकर गंभीर नोटिस जारी किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश के विभिन्न थानों में, खासकर थानों के परिसर में, अवैध रूप से धार्मिक स्थल, विशेष रूप से मंदिर बनाए जा रहे हैं, जो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 20 साल पहले स्पष्ट रूप से आदेश दिए थे कि सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर कार्यालयों और सार्वजनिक सड़कों पर धार्मिक स्थलों का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसके तहत राज्य सरकार के सभी मुख्य सचिवों को निर्देश दिए गए थे कि कलेक्टरों के माध्यम से इस आदेश का पालन सुनिश्चित करें। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य के कलेक्टर, जिला मजिस्ट्रेट और आरएसपी अधिकारियों को इस निर्माण कार्य के बारे में सूचित किया गया था, लेकिन किसी भी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, और निर्माण कार्य लगातार जारी रहा।
उन्होंने कहा कि अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि जो धार्मिक स्थल पहले से इन थानों में बने हुए हैं, उनकी स्थिति रिपोर्ट पेश की जाए। अगर कोई निर्माण कार्य चल रहा है या छत डाली जा रही है, तो उस पर तुरंत रोक लगाई जाए। अदालत ने यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया है कि इन अवैध निर्माणों को जल्द से जल्द हटाया जाए और जो नए निर्माणाधीन धार्मिक स्थल हैं, उन पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए।