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संविधान पर चर्चा: ‘आपातकाल देश को बचाने के लिए नहीं, बल्कि कुर्सी को..’, जेपी नड्डा का कांग्रेस पर जोरदार हमला

केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने राज्यसभा में मंगलवार को कहा कि अगले साल आपातकाल लगाए जाने के 50 वर्ष पूरे हो जाएंगे। हम “लोकतंत्र विरोधी दिवस” मनाएंगे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को इसमें शामिल होना चाहिए।

संविधान पर चर्चा के दौरान कही गई बातें
राज्यसभा में मंगलवार को संविधान पर बहस के दौरान केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कांग्रेस पर कई मुद्दों को लेकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बल्कि यह लोकतंत्र की जननी भी है।

नड्डा ने कहा, “हम जो भी त्योहार मनाते हैं, वह संविधान के प्रति हमारे समर्पण और प्रतिबद्धता को मजबूत करता है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम इस अवसर का उपयोग राष्ट्रीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए करेंगे। भारत सिर्फ सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जननी भी है।”

संविधान और संस्कृति पर जोर
नड्डा ने कहा कि कई लोग संस्कृति को प्रगतिशीलता के खिलाफ मानते हैं, लेकिन संविधान की मूल प्रति में अजंता और एलोरा की गुफाओं की छाप थी। उन्होंने कहा, “कमल का प्रतीक हमें यह प्रेरणा देता है कि कठिन परिस्थितियों से निकलकर हम लोकतंत्र को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।”

सरदार पटेल की भूमिका पर चर्चा
उन्होंने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश की 562 रियासतों का विलय कर देश को एकजुट किया, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर को अलग कर दिया।

आपातकाल पर कांग्रेस पर हमला
जेपी नड्डा ने कहा, “अगले साल आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होंगे। हम लोकतंत्र विरोधी दिवस मनाएंगे। कांग्रेस को इसमें शामिल होना चाहिए और जनता से माफी मांगनी चाहिए। आपातकाल क्यों लगाया गया था? क्या देश खतरे में था? नहीं, कुर्सी खतरे में थी। इसके चलते पूरा देश अंधेरे में डूब गया।”

अनुच्छेद 370 पर निशाना
नड्डा ने कहा कि अनुच्छेद 35ए को 1954 में बिना बहस के राष्ट्रपति के आदेश से लागू किया गया। यह परिभाषित करता था कि जम्मू-कश्मीर का नागरिक कौन होगा। उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 370 के कारण कई कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होते थे, जैसे कि अत्याचार निवारण अधिनियम और मानवाधिकार अधिनियम।

उन्होंने कहा, “जवाहरलाल नेहरू महिलाओं के संपत्ति अधिकार के पैरोकार थे, लेकिन कश्मीरी महिलाओं को गैर-कश्मीरी से शादी करने पर संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया जाता था।”

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किसी भी प्रकार की सहायता के लिए संपर्क करेंरविकांत उपाध्याय

नई दिल्ली, एजेंसी
संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया है। इस सत्र में वक्फ बोर्ड पर नया बिल आ सकता है। इस बिल को मॉनसून सत्र में लोकसभा में पेश किया गया था,लेकिन बाद में इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी को भेज दिया गया था। इस बिल पर जेपीसी की बैठक में कई बार हंगामा हुआ। अब जब इसे संसद में पेश किया जाएगा तो हंगामा होना तय है। पर सवाल उठता है कि संशोधन की जरूरत क्यों? वक्फ बोर्ड को नियंत्रित करने वाला कानून 1954 से है। अब सरकार इसमें संशोधन करने जा रही है। सरकार का दावा है कि नया कानून, मौजूदा कानून की खामियों को दूर करेगा। साथ ही वक्फ की संपत्तियों का पहले से बेहतर मैनेजमेंट हो सकेगा। वक्फ की संपत्तियां अक्सर विवादों में रहती है। वो इसलिए क्योंकि ऐसी संपत्तियां अल्लाह के नाम पर होती हैं और इनका कोई वारिस नहीं होता। हालांकि, 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि एक बार जो संपत्ति वक्फ हो जाती है, वो हमेशा वक्फ रहती है।
दिल्ली में 200 से ज्यादा संपत्तियों
को वक्फ घोषित
हाल ही में वक्फ की कई संपत्तियों पर विवाद खड़ा हुआ है। हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें दावा किया गया था कि दिल्ली में 200 से ज्यादा ऐसी संपत्तियों को वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया गया है, जो दो अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के नियंत्रण में थीं। सितंबर में इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में बताया था कि वक्फ घोषित की गईं 108 संपत्तियों का नियंत्रण एल एंड डीओ के पास था, जबकि 138 संपत्तियां दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के पास थीं। ये जानकारी अधिकारियों ने संसद की जेपीसी को दी थी।
इस्लाम को मानने वाला व्यक्ति अल्लाह या धर्म के नाम पर दान करता है
वक्फ कोई भी चल या अचल संपत्ति होती है, जिसे इस्लाम को मानने वाला व्यक्ति अल्लाह या धर्म के नाम पर दान करता है। एक बार जो संपत्ति वक्फ की हो गई, वो हमेशा वक्फ की ही रहती है। माना जाता है कि अल्लाह के अलावा वक्फ संपत्ति का मालिक न कोई होता है और न हो सकता है। ऐसी संपत्ति किसी के नाम भी नहीं की जा सकती। जानकार बताते हैं कि किसी संपत्ति को वक्फ कर देना का मतलब है उसे अल्लाह के नाम कर देना। वक्फ संपत्ति से जो भी फायदा होता है, उसका इस्तेमाल जरूरतमंदों के लिए किया जाता है।
इस्लाम को मानने वाला जो व्यक्ति अपनी संपत्ति दान करता है, उसे वाकिफ कहा जाता है। ऐसी संपत्ति का प्रबंधन करने वाले को मुतवल्ली कहा जाता है। इन संपत्तियों के प्रबंधन की निगरानी वक्फ बोर्ड के पास होती है। हर राज्य में वक्फ बोर्ड है। झारखंड और यूपी में शिया और सुन्नी के अलग-अलग वक्फ बोर्ड हैं। कुल मिलाकर देशभर में 32 वक्फ बोर्ड हैं। वक्फ बोर्ड से ऊपर सेंट्रल वक्फ काउंसिल होती है।
404 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड दावा
केरल में काफी लंबे वक्त से वक्फ की संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है। केरल के एनार्कुलम जिले में पड़ने वाले मुनम्बम तट के पास की 404 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड लंबे वक्त से दावा कर रहा है। इस जमीन पर 600 से ज्यादा हिंदू और ईसाई परिवार रहते हैं।
वक्फ बोर्ड के पास 8.72 लाख से ज्यादा संपत्ति
केंद्र सरकार के मुताबिक, दुनिया में सबसे ज्यादा वक्फ संपत्तियां भारत में हैं। वक्फ बोर्ड के पास 8.72 लाख से ज्यादा संपत्तियां हैं, जो 9.4 लाख एकड़ में फैली हैं। इनकी अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ रुपये है। रेलवे और रक्षा विभाग के बाद सबसे ज्यादा संपत्ति वक्फ बोर्ड के पास ही है।

                   वक्फ संपत्ति
  1. तमिलनाडु के तिरुचेंतुरई गांव की पूरी जमीन को वक्फ की संपत्ति घोषित किया गया है। कहा जाता है कि इस जमीन को 1956 में नवाब अनवरदीन खान ने वक्फ के लिए दान कर दिया था। वक्फ की संपत्ति होने के कारण यहां की जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक है। जमीन की गैरकानूनी बिक्री रोकने के लिए वक्फ बोर्ड ने इसे ह्यजीरो वैल्यूह्ण के तौर पर रजिस्टर करने की मांग की थी। हालांकि, अल्पसंख्यक मंत्रालय ने यहां के किसी भी तरह के लेन-देन पर रोक लगा दी है।
  2. बेंगलुरु के ईदगाह ग्राउंड पर भी विवाद है। सरकार के मुताबिक, यहां की जमीन कभी भी किसी मुस्लिम संगठन या वक्फ को नहीं दी गई। लेकिन वक्फ बोर्ड का दावा है कि 1850 से ये वक्फ की संपत्ति है, इसलिए हमेशा वक्फ की ही संपत्ति रहेगी।
  3. हाल ही में गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर दावा किया था। वक्फ बोर्ड का दावा है कि मुगल काल के दौरान सूरत नगर निगम की इमारत एक सराय थी और हज यात्रा के दौरान इसका इस्तेमाल होता था। ब्रिटिश शासन के दौरान ये संपत्ति अंग्रेजों के पास चली गई। लेकिन 1947 में जब आजादी मिली तो सारी संपत्तियां भारत सरकार के पास आ गई।
  4. गुजरात वक्फ बोर्ड ने द्वारका में बेट द्वारका के दो द्वीपों पर भी दावा किया था। इस पर दावे की मांग को लेकर वक्फ बोर्ड ने हाईकोर्ट में याचिका भी दाखिल की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस याचिका को ये कहते हुए सुनने से इनकार कर दिया था कि वक्फ बोर्ड कृष्ण नगरी द्वारका की जमीन पर दावा कैसे कर सकता है।
  5. सूरत की शिव सोसायटी में रहने वाले एक शख्स ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड को दे दिया। इसके बाद यहां लोगों ने नमाज अदा करना शुरू कर दिया। इसका मतलब ये था कि किसी भी हाउसिंग सोसायटी में कोई व्यक्ति किसी अपार्टमेंट या जमीन को बाकी लोगों की मंजूरी के बिना वक्फ को दे सकता है और वो जगह मस्जिद बन सकती है। अब यहां काफी तनाव बना रहता है।

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नए कानून का ड्राफ्ट तैयार: मप्र में लोक सुरक्षा कानून लागू करने की तैयारी रैली-जुलूस, प्रवचन में जरूरी होगा सीसीटीवी

हिन्दुस्तान मेल, भोपाल
मध्यप्रदेश सरकार लोक सुरक्षा कानून यानी पब्लिक सेफ्टी एक्ट लागू करने की तैयारी में है। इस कानून के तहत सार्वजनिक और व्यवसायिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाना जरूरी होगा। जो लोग ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें जुर्माना भरना पड़ेगा। गृह विभाग ने इस कानून का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। ड्राफ्ट के मुताबिक, शादी चाहे मैरिज गार्डन में हो या निजी स्थान पर, इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग जरूरी होगी। किसी जगह 100 से एक हजार तक या उससे ज्यादा लोग इकट्ठा होते हैं, वहां सीसीटीवी कैमरा लगाना जरूरी होगा।
इसके दायरे में कॉलेज, स्कूल, मॉल, रेस्टोरेंट, अस्पतालों के साथ राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम, रैलियां और जुलूस भी आएंगे। नए एक्ट के मुताबिक, वीडियो फुटेज को दो महीने तक सुरक्षित रखना पड़ेगा। पुलिस के मांगने पर इसे देना भी पड़ेगा। सीसीटीवी लगाने का खर्च संबंधित प्रतिष्ठान या कार्यक्रम का आयोजक उठाएगा। सरकार ने तीन महीने पहले इंदौर में इसका पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था, जो सफल माना जा रहा है। नए कानून के ड्राफ्ट को परीक्षण के लिए विधि विभाग को भेजा गया है। मध्यप्रदेश में हर दस साल में 20 फीसदी की दर से आबादी बढ़ रही है। जनगणना विभाग के अनुमान के मुताबिक, 2024 के अंत तक मप्र की आबादी 8.88 करोड़ के करीब होगी यानी 2011 की आबादी के मुकाबले 22 फीसदी की बढ़ोतरी। बढ़ती आबादी और शहरीकरण के चलते सर्विलांस की जरूरत महसूस की जा रही है।
दिल्ली में 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद जस्टिस उषा मेहरा आयोग ने देश में महिला सुरक्षा को बढ़ाने के लिए कई उपाय सुझाए थे। इनमें से एक सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाना भी था। आयोग ने यह भी सुझाव दिया था कि सार्वजनिक स्थानों और सार्वजनिक परिवहन के अलावा पीसीआर वैन और पुलिस स्टेशनों में भी सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने चाहिए।
2020 से की जा रही है तैयारी
मध्यप्रदेश में लोक सुरक्षा कानून बनाने की तैयारी साल 2020 से चल रही है। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर गृह विभाग ने इसकी कवायद शुरू कर दी थी। गृह विभाग ने ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया था, मगर ये लागू नहीं हो सका। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में संभागीय समीक्षा के दौरान इस काम में तेजी लाने के निर्देश दिए थे।
निगरानी के लिए बनेंगी कमेटियां
निगरानी के लिए चार स्तर पर कमेटियों का गठन किया जाएगा। मॉनिटरिंग एंड कंट्रोल कमेटी (निगरानी और नियंत्रण समिति) सबसे प्रमुख होगी। इसके बाद सुपरवाइजिंग कमेटी (पर्यवेक्षण समिति), इम्प्लीमेन्टेशन कमेटी (क्रियान्वयन समिति) और सेक्टोरल कमेटी यानी क्षेत्रीय समिति होगी। चारों समितियों के अधिकार और काम तय किए जाएंगे।
इंदौर में पायलट प्रोजेक्ट
लोक सुरक्षा कानून को लागू करने से पहले सरकार ने इंदौर में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 12 सितंबर 2024 को इसकी शुरूआत की थी। इसे लागू करने के लिए नगर पालिका निगम एक्ट 1956 में बायलॉज जोड़े गए। इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव बताते हैं कि सामुदायिक निगरानी प्रणाली को जनभागीदारी से लागू करवाया है। इसके तहत शहर में हजारों नए सीसीटीवी लगाए गए हैं।
नए कानून में यह प्रावधान
ल्ल शादी मैरिज गार्डन में हो या निजी स्थान पर, उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा।
ल्ल यदि किसी स्थान पर 100 से एक हजार या उससे ज्यादा लोग इकठ्‌ठा होते हैं तो वहां सीसीटीवी कैमरा लगाना जरूरी होगा।
ल्ल संचालकों को सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग को 2 माह के लिए सुरक्षित रखना जरूरी होगा।
ल्ल यदि विशेष स्थिति में पुलिस या जांच एजेंसी इसकी मांग करती है तो वीडियो रिकॉर्डिंग को देना जरूरी होगा।
ल्ल संस्थान- प्रतिष्ठानों को खुद के खर्च पर ही सीसीटीवी कैमरे लगाने होंगे।

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1.10 करोड़ से निखरेगा शास्त्री ब्रिज से पलासिया चौराहे तक का हिस्सा

इंदौर। शहर में चल रहे स्वच्छता अभियान के साथ अब इंदौर नगर निगम शहर को सुंदर बनाने के भी प्रयास कर रहा है। जहां एक ओर वॉल पेंटिंग्स और स्कल्पचर बनाए जा रहे है। वहीं अब सात दशक से अधिक पुराने शास्त्री ब्रिज पर भी प्री कॉस्ड रोड डिवाइडर हटाकर रैलिंग लगाने का काम शुरू हो गया है। अब इस पर शास्त्री ब्रिज से पलासिया चौराहे तक दो किमी की दूरी पर 1.10 करोड़ की लागत से 80 जीआई कट वाले सेंट्रल पोल लगाने की तैयारी कर रहा है। इस पर एलईडी से सेंट्रल लाइटिंग की जाएगी। अपर आयुक्त नरेंद्र नाथ पांडे ने बताया कि शहर के मुख्य मार्ग शास्त्री ब्रिज से पलासिया चौराहे तक एक जैसी लाइटिंग और पोल लगाने के उद्देश्य से यह योजना बनाई है, जिससे शहर की सुंदरता बढ़ेगी। इसकी स्वीकृति मिल चुकी है। टेंडर होना बाकी है। टेंडर होते ही अगले 15 से 20 दिन में काम पूरा कर लिया जाएगा।

नगर निगम शहर के अलग-अलग हिस्सों में रोशनी के लिए एलईडी लाइट लगाने का काम तेज गति से कर रहा है। कई इलाकों में जहां स्ट्रीट लाइट नहीं थी वहां नए पोल लगाए जा रहे हैं, या जरूरत के हिसाब से सेंट्रल लाइट लगाने का काम किया जा रहा है। इसी के तहत वार्ड-13 के इंदौर वायर चौराहा से लक्ष्मीबाई नगर तक सेंट्रल लाइट लगाने की शुरूआत की गई है। यह इंडस्ट्रीयल एरिया है इसके चलते सेंट्रल लाइट की जरूतत ज्यादा है। सड़क पर प्रीकॉस्ट डिवाइडर के बीच सेंट्रल लाइट लागने का काम किया जा रहा है। जिसका ठेका भोपाल की कंपनी को मिला है। कंपनी ने पोल के लिए सड़क पर गड्ढे करने का काम शुरू कर दिया है।
पार्षद पराग कौशल ने बताया कि आधा किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़क पर 10 लाख की लगात से 22 पोल लगाए जाएंगे। जिन पर एलईडी लाइट लगाई जाएगी। इसका काम को भोपाल की कंपनी कर रही है। कुछ दिक्कतें है जिन्हें जल्द दूर कर काम तेज गति से किया जाएगा। अगल कुछ दिनों में इसे पूरा कर वार्डवासियों को नई सौगात दी जाएगी।

1953 में हुआ था निर्माण
शास्त्री ब्रिज का निर्माण 1953 में हुआ था। शहर में रहने वाले कई लोगों की पीढ़ियां इस ब्रिज का उपयोग कर रही है। शहर के ट्रैफिक के बढ़ते दबाव के कारण कुछ वर्षों पहले सरदार पटेल ब्रिज बनाया गया था, लेकिन फिर भी शास्त्री ब्रिज से ट्रैफिक लोड कम नहीं हुआ। फिलहाल शास्त्री ब्रिज मरम्मत मांग रहा है। ब्रिज के फुटपाथ कई हिस्सों में धंस रहे है। रैलिंग वाले हिस्से में कई जगह दरारें आ चुकी है।

आर्टिफिशियल ट्री और क्रॉप्स भी लगाए जाएंगे
एमआर-10 ब्रिज पर लगाए गए जीआई पोल्स की तरह ही यहां भी इन पोल्स पर सेंट्रल लाइटिंग की जाएगी, इसकी के साथ एमजी रोड को सुंदर बनाने के उद्देश्य से यहां पौधारोपण और आर्टिफिशियल ट्री के साथ-साथ क्रोप्स और स्कल्पचर भी लगाए जाएंगे। इन्हें निगम पहले ही ले चुका है। शास्त्री ब्रिज पर लोड कम करने से उद्देश्य से यहां रखे कांक्रीट के प्री कॉस्ट रोड डिवाइडर को हटाया है। इनकी जगह पर बीम डालने का काम पूरा हो गया है। अब रैलिंग और लाइटिंग का काम बचा है। निगम अधिकारी दावा है कि इसका काम तेजी से चल रहा है और अगले एक माह में इसे पूरा कर लिया जाएगा।

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गांधी प्रतिमा बनी आंदोलन का अखाड़ा

हिन्दुस्तान मेल, इंदौर
पिछले तीन दिन से रीगल का गांधी प्रतिमा चौक आमरण अनशन और सत्याग्रह का अखाड़ा बन चुका है। एक तरफ जहां अपनी कंपनी हड़पने वालों के खिलाफ एनआरआई गौरव अहलावत आमरण अनशन पर आमादा हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली के कुछ सेठों के साथ मजदूर महिलाएं अहलावत के खिलाफ हाथ में तख्तियां लेकर गौरव के साथ गांधीजी को बार-बार घेर रही हैं। गांधी-भक्त पुलिस का मामले में असयोग आंदोलन जारी है।
गौरव ने इंदौर में अपनी जमापूंजी लगाकर जीआरवी बिस्किट नाम की कंपनी खड़ी थी। इस कंपनी पर उनके कथित भागीदारों ने कब्जा करके उन्हें बाहर कर दिया। पिछले 75 दिनों से कब्जेदारों के खिलाफ उनका संघर्ष जारी है। लसूड़िया थाने से लेकर डीजीपी कार्यालय तक अपनी बात रख चुके हैं, लेकिन मंत्री तुलसीराम सिलावट के भागीदार होने के कारण आरोपियों पर अब तक केस दर्ज नहीं हुआ। शिकायतों की अनदेखी से परेशान गौरव ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। जो लगातार दो दिन से जारी है। आज तीसरा दिन है। वे वहां संविधान की किताब लेकर बैठे हैं। न्याय के लिए जंग में इंदौर का साथ मांग रहे हैं। दूसरी तरफ कुछ लोगों के नेतृत्व में मजदूर अहलावत के खिलाफ तख्तियां लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जून से उन्हें तनखा नहीं मिली। चार महीने हो चुके हैं, गौरव हमारा पैसा दे।
कुछ लोग स्वयं को दिल्ली का कारोबारी बताते हैं, कहते हैं कि गौरव ने हमें दिल्ली ठगा और इंदौर में 2019 में मारपीट की थी। पुलिस ढूंढ रही है। पकड़ में नहीं आता।

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