

इंदौर। किसानों के हित में कागजों पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाने वाले सरकारी अधिकारियों और नेता-मंत्री को जरा जमीन पर उतरकर हकीकत भी जानना चाहिए। कागजों पर तो सरकार किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर सोयाबीन की खरीदी कर रही है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस बात का उल्लेख अपने भाषणों में भी कर रहे हैं लेकिन हकीकत उसके उलट है। किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम मूल्य भी नहीं मिल रहा हैङ्घअधिकत्म मूल्य तो दिन में सपने देखने जैसा है। मालवा सोयाबीन उत्पादन का गढ़ है लेकिन वर्तमान में इंदौर के साथ ही प्रदेश भर के सोयाबीन उत्पादन किसान परेशान है। क्योंकि उन्हें उनकी फसल का लागत मूल्य ही नहीं मिल रहा है। प्रदेश सरकार ने कुल उत्पादन में से मात्र 26 फीसदी ही खरीदने की बात कही है उसमें भी 12 फीसदी से अधिक नमी वाली फसलों को सख्ती से रिजेक्ट किया जा रहा है। सोयाबीन के साथ कपास उत्पादन करने वाले किसानों की फसल भी एमएसपी से नीचे ही बिक रही है। इससे पहले मूंग बोने वाले किसानों को भी अपनी फसल काफी कम कीमतों पर बेचना पड़ी थी। कुल मिलाकर प्रदेश का अन्नदाता परेशान हैं और सरकार के मंत्रियों और सत्तधारी दल के नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ रहा।
मात्र 9718 ने कराया पंजीयन…
एमएसपी पर सोयाबीन बेचने के लिए 25 सितंबर से 20 अक्टूबर तक पंजीयन किए गए थे। उसमें काफी कम किसानों ने पंजीयन करवाया है। मप्र के 3 लाख 43 हजार किसानों ने पंजीयन करवाया है। वहीं इंदौर जिले से 9718 किसानों ने एमएसपी पर अपनी फसल बेचने के लिए पंजीयन करवाया है। किसान नेताओं का कहना है कि पंजीयन में काफी परेशानियां हो रही थी जिसके चलते इंदौर जिले में मात्र 10 फीसदी किसानों ने ही पंजीयन करवाया है। इंदौर जिले में सोयाबीन खरीद के लिए 15 केंद्र बनाए गए हैं। वर्तमान में पंजियन बंद कर दिया गया है।
इंदौर के साथ ही मप्र के सोयाबीन उत्पादक किसान अपनी फसल का उचित दाम नहीं मिलने से परेशान है। मप्र की मंडियों में सोयाबीन की कीमतें वर्तमान में एमएसपी से नीचे ही चल रही है। प्रदेश सरकार द्वारा एमएसपी 4892 रुपए प्रति क्विंटल पर 25 अक्टूबर से सोयाबीन खरीदी प्रारंभ होने का दावा किया है। लेकिन हकिकत इसके उलट है। मंडियों में किसानों की फसल एमएसपी पर बिक ही नहीं पा रही है। एमएसपी पर खरीदी के लिए मप्र में 460 उपार्जन केन्द्र बनाए गए है। लेकिन अधिकांश केन्द्रों पर सरकारी खरीदी अब तक प्रारंभ ही नहीं हुई है। उल्लेखनीय है कि मप्र सरकार की मांग पर केन्द्र सरकार ने 13.68 लाख टन सोयाबीन के उपार्जन की अनुमति प्रदान की है।
फिलहाल जिन केन्द्रों पर सरकारी खरीद प्रारंभ है वहां पहुंचने वाले किसानों को नियमों का हवाला देकर माल खरीदने से इंकार किया जा रहा है। प्रदेश सरकार द्वारा 12 फीसदी तक नमी वाले सोयाबीन को खरीदने की बात कही गई है। वहीं जिन किसानों के सोयाबीन में नमी की मात्रा 12 फीसदी से दशमलव एक फीसदी भी ज्यादा है, नियमों का हवाला देकर उनका सोयाबीन नहीं लिया जा रहा है। इस संबंध में मप्र के किसान संगठनों में खासा रोष देखा जा रहा है। किसान नेताओं का कहना है कि आधा फीसदी नमी ज्यादा होने पर भी माल रिजेक्ट किया जा रहा है। जबकि अधिकारियों को भी यह पता है कि तुलाई करने के बाद गोदाम तक जाते-जाते नमी में काफी कमी आ जाती है। किसान नेताओं का कहना है कि मप्र की मंडियों में किसानों को सोयाबीन का एमएसपी रेट 4892 मिलना तो दूर की कौड़ी है, हकिकत में तो किसानों को उससे बहुत कम दामों पर अपनी फसल व्यापारियों को बेचना पड़ रही है। वर्तमान में मप्र की मंडियों में सोयाबीन के भाव 3500 से 4400 रुपए प्रति क्विंटल के मध्य बोले जा रहे हैं जो एमएसपी मूल्य 4892 से काफी कम है। इंदौर मंडी में सोयाबीन के भाव 3500 से 4250 रुपए हैं। वहीं उज्जैन में सोयाबीन का औसत मूल्य 4250 रुपए है। देवास, धार, खंडवा, खरगोन सहित संपूर्ण मालवा निमाड़ की सभी मंडियों में सोयाबीन के भाव एमएसपी से काफी नीचे हैं। प्लांट रेट भी 4500 से 4600 रुपए प्रति क्विंटल के मध्य है। मप्र की मंडियों में फिलहाल सोयाबीन की औसत आवक 65 से 70 हजार बोरी प्रतिदिन हो रही है।
52 लाख उत्पादन, खरीदेंगे सिर्फ 13 लाख टन..
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन आॅफ इंडिया (सोपा) के अनुसार इस बार मप्र में लगभग 52 लाख टन सोयाबीन का उत्पादन हुआ है। जबकि मप्र सरकार द्वारा एमएसपी पर मात्र 13.68 लाख टन सोयाबीन का उपार्जन करने की बात कही है। जो कि कुल सोयाबीन उत्पादन का मात्र 26 फीसदी ही है। शेष 74 फीसदी सोयाबीन जो कि 38.42 लाख टन होता है उसे सरकार नहीं खरीदेगी। इन किसानों को कम कीमत पर अपनी फसल व्यापारियों को बेचना ही पड़ेगी। वहीं सरकार ने एमएसपी पर 13.68 लाख टन सोयाबीन खरीदने के लिए जो कवायद प्रारंभ की है उसमें भी अधी खरीदी ही होने की बात जानकारों द्वारा की जा रही है।