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केंद्र चलाएगा 10 हजार आई-बस कामगारों को 1 लाख का लोन मिलेगा

कैबिनेट ने विश्वकर्मा योजना को मंजूरी दे दी। इसके जरिए देश के छोटे कामगारों को लोन से लेकर स्किल डेवलप करने में मदद मिलेगी। इस स्कीम पर 5 साल में सरकार के 13,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे। विश्वकर्मा योजना का लक्ष्य बुनकर, सुनार, लोहार, कपड़े धोने का काम करने वाले, नाई आदि को सशक्त बनाना है।
इसके अलावा पीएम ई-बस सेवा के तहत 10,000 बसों को चलाने की भी मंजूरी दी गई है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और अनुराग ठाकुर ने कैबिनेट फैसलों की जानकारी दी। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने बताया कि पीएम ई-बस सेवा योजना पर 57,613 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। इसमें से 20,000 करोड़ रुपए केंद्र सरकार और शेष राज्य सरकारें देंगी। इसके तहत देश भर में लगभग 10,000 नई इलेक्ट्रिक बसें उपलब्ध कराई जाएंगी।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर बसों का संचालन होगा। यह योजना 3 लाख और उससे अधिक आबादी वाले 169 शहरों को कवर करेगी। इस योजना से 45,000 से 55,000 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है।
कैबिनेट ने रेल मंत्रालय की सात परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इस पर लगभग 32,500 करोड़ रुपए खर्च होंगे। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि ये परियोजनाएं भारतीय रेलवे के मौजूदा नेटवर्क में 2,339 किलोमीटर का विस्तार करेगी।

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हिमाचल में प्रकृति का कहर 2500 लोगों को विस्थापित किया

शिमला के समरहिल में सोमवार हुए भूस्खलन के कारण निचली ओर बने शिवमंदिर और अन्य मलबे में दब गए। सोमवार को आठ शव निकाले गए। मंगलवार को फिर एनडीआरएफ की टीम ने रेस्क्यू आॅपरेशन तेज कर दिया। अभी तक चार और शवों को निकाल लिया गया है। अभी तक 12 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं। इसे देखते हुए ढाई हजार लोगों को विस्थापित किया गया है। हिमाचल प्रदेश में इस साल मानसून सीजन में 7500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, जबकि 327 लोगों की जान गई है। इनमें से 71 लोगों की मौत पिछले चार दिन में हुई है। राज्य सरकार ने केंद्र से 6600 करोड़ रुपए की मदद की मांग की है। समरहिल में एक ही परिवार के सात लोग भी लापता हैं। अपनों का अभी तक पता नहीं चलने से परिजन परेशान हैं। समरहिल में अभी भी कम से कम 20 लोग दबे हुए हैं। ये वो लोग हैं, जो शिवमंदिर में थे, लेकिन इसके अलावा रास्ते से निकल रहे कितने लोग भूस्खलन की चपेट में आए… उसकी जानकारी नहीं है। स्थानीय पार्षद ने यह जानकारी दी है। स्थानीय प्रशासन के अनुसार जब भूस्खलन हुआ तो मंदिर में पूजा का कार्य चल रहा था।

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अब लाल किले से क्या बोलने वाले हैं पीएम?

विपक्षी गठबंधन कठऊकअ द्वारा पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के बाद हुए मतदान में सरकार चाहे ध्वनिमत के आधार पर विजयी घोषित कर दी गई हो, माना जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री तो हार गए थे! दो घंटे बारह मिनट तक धुआंधार भाषण देते रहने के बाद नरेंद्र मोदी थके हुए दिखाई पड़ने लगे थे। वॉक आउट के बाद सदन में विपक्ष की अनुपस्थिति उनके चेहरे पर आने लगी थी। वे बार-बार विपक्ष की खाली बेंचों की तरफ देख रहे थे।
पांच बजकर आठ मिनट पर जब पीएम ने ‘माननीय अध्यक्षजी’ कहते हुए बोलने के शुरुआत की… तब वाले नरेंद्र मोदी अलग थे। सात बजकर बीस मिनट पर जब उन्होंने बोलना बंद किया, तब तक वे अपना प्रारंभिक अवतार खो चुके थे। एनडीए के मंत्री और सांसद तब तक अपनी मेजें थपथपाने की आवाज काफी धीमी कर चुके थे। उनके चेहरों के रंग उड़ने लगे थे। दूसरी ओर, जिस विपक्ष को पीएम सदन के भीतर मतदान के मार्फत पराजित होते देखने का सुख प्राप्त करना चाहते थे, वह विजेता-भाव से संसद के बाहर से देश को जानकारी दे रहा था कि मोदी ने मणिपुर को किस तरह संसद में निराश किया!
मणिपुर की त्रासदी पर अविश्वास प्रस्ताव के जरिए पूछे गए ढेर सारे सवालों में पीएम ने एक का भी जवाब नहीं दिया। कोई डेढ़ घंटे तक स्वयं की उपलब्धियों का गुणगान कर लेने; विपक्ष, गांधी परिवार और जवाहरलाल नेहरू से लगाकर मनमोहन सिंह के माथों पर सारी समस्याओं के ठीकरे फोड़ लेने के बाद जब पीएम ने देश के उत्तर-पूर्व में प्रवेश किया, तब तक विपक्ष सदन खाली कर चुका था। अपने द्वारा बोले जा रहे शब्दों की आवाज या तो सिर्फ प्रधानमंत्री स्वयं सुन रहे थे या फिर एनडीए के अनुशासनबद्ध सांसद।
अविश्वास प्रस्ताव को लेकर तीन दिनों तक देश की संसद ने जो दृश्य देखा, वह अभूतपूर्व था। सब कुछ तब भी विपक्ष के बहिष्कार के बीच नई संसद में स्थापित किए गए ‘सेंगोल’ या ‘राजदंड’ की परछाई से दूर पुरानी संसद में घटित हो रहा था। संसद के शीतकालीन सत्र की बैठकें ही संभवत: नए भवन में होंगी, पर तब तक तो राजनीति की यमुना में काफी पानी बह चुकेगा!
अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के उत्तर में पीएम की विचलित दिखाई पड़ती मुद्रा और उनकी बिखरी-बिखरी शाब्दिक प्रस्तुति के जरिए जो प्रभाव उत्पन्न हुआ, उसका सार यही बताया जा सकता है कि वे ‘तीसरी बार भी मोदी सरकार’ को लेकर जनता की ओर से आश्वस्त होना चाह रहे थे। वैसे गृहमंत्री अमित शाह यह काम एक दिन पहले ही अपनी पूरी क्षमता के साथ कर चुके थे। प्रधानमंत्री ने एक बार भी ऐसा नहीं महसूस होने दिया कि वे विपक्ष को जवाब दे रहे हैं। वे उस जनता को संबोधित कर रहे थे, जो उनकी आंखों के सामने नहीं थी और जिस विपक्ष को जनता की नजरों में गिराना चाहते थे, वह सदन से वॉक आउट कर चुका था।
यहां इस तथ्य का उल्लेख किया जाना जरूरी है कि सदन में उपस्थित सदस्यों में मणिपुर की जनता द्वारा चुनकर भेजे गए वे दो संसद भी थे, जिन्हें उनके ही राज्य से संबंधित अविश्वास प्रस्ताव पर बोलने से वंचित रखा गया। इनमें एक सांसद भाजपा के और दूसरे एनडीए के सहयोगी दल नगा पीपुल्स फ्रंट के थे। भाजपा के सांसद (राजकुमार रंजन सिंह) केंद्र में राज्यमंत्री भी हैं। पहले अमित शाह और बाद में नरेंद्र मोदी विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी को बार-बार शर्मसार करते हुए पूछते रहे कि उनका नाम बोलने वालों की सूची में क्यों नहीं शामिल किया गया?
प्रधानमंत्री के उद्बोधन से जिस तरह की ध्वनियां देशभर में गूंज रही थीं, उनसे यही आभास होता था कि पूरी एनडीए सरकार को विपक्ष के सिर्फ एक आदमी ने भयभीत कर रखा है। प्रधानमंत्री ने अधीर रंजन का तो कई बार नाम लिया, राहुल गांधी का एक बार भी नहीं, जबकि सबसे ज्यादा प्रहार उन पर ही किए गए। प्रधानमंत्री जब ह्यकठऊकअह्ण को ‘घमंडिया’ निरूपित करते हुए उसमें निहित दो ‘क’ (आई) को विपक्षी गठबंधन के अहंकार का प्रतीक बता रहे थे, संसद के बाहर संदेश यही जा रहा था कि मोदी अपनी पिछली दो पारियों की तरह तीसरी को लेकर आश्वस्त नहीं हैं!
लोकसभा में जो हुआ, उससे स्पष्ट है कि राहुल गांधी ने 2024 को लेकर सरकार के तय एजेंडे को बदल दिया है और अपना एजेंडा उस पर थोप दिया है। वह एजेंडा अभी मणिपुर है, जो चुनावों के आते-आते और कुछ भी बन सकता है। आश्चर्य व्यक्त किया जाना चाहिए कि गृहमंत्री ने अपने भाषण का दो-तिहाई से ज्यादा समय प्रधानमंत्री की उपलब्धियों पर खर्च किया और प्रधानमंत्री ने उतना ही समय बजाय मणिपुर पर जवाब देने के राहुल, गांधी परिवार, कांग्रेस और कठऊकअ पर हमले करने में झोंक दिया।
स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास की कार्रवाई में शायद पहली बार दर्ज हुआ होगा कि किसी प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी और गठबंधन के सांसदों से सदन में नारेबाजी करवाई। सिर्फ एक बार नहीं… कई बार। पीएम ने एक से अधिक बार दावा किया कि एनडीए गठबंधन 2024 में अपने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़कर सत्ता में आएगा और जोड़ा- मोदी गारंटी दे सकता है कि देश को टॉप-थ्री की पोजीशन में लाकर रहेगा।
प्रधानमंत्री से पूछने की हिम्मत कौन कर सकता है कि उनके एक सौ बत्तीस मिनट के उद्बोधन का देश की जनता ने किस तरह स्वागत किया होगा! मोदी जब राहुल गांधी का बिना नाम लिए उन पर प्रहार कर रहे थे, तब उन लाखों-करोड़ों लोगों के दिलों पर क्या गुजरी होगी, जो ऐतिहासिक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान इस युवा नेता के लिए पलकें बिछाए घंटों इंतजार करते रहते थे। देश की जनता ने और किसी भी प्रधानमंत्री को विपक्ष के एक नेता के बारे में ऐसा बोलते हुए नहीं सुना होगा कि कल यहां (सदन में) दिल से बात करने की बात कही गई थी। दिमाग का पता तो देश को है। (राहुल गांधी ने अपने भाषण में फारसी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी के कथन का उल्लेख करते हुए कहा था कि वे ‘आज दिमाग से नहीं, दिल से बोलना चाहता हूं।’ रूमी कथन यह था कि जो शब्द दिल से आते हैं, दिल में जाते हैं।
मोदी हैं तो मुमकिन है कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा में जो कुछ कहा, उसके पीछे उनका कोई गहरा सोच रहा हो! उनके हाथों में कागज थे। वे उन कागजों को देख-देखकर बोल रहे थे। वे कागज शायद देश का भविष्य निर्धारित करने वाले दस्तावेज थे। गुजरात का राजनीतिक इतिहास साक्षी है कि सत्ता में बने रहने के लिए मोदी किसी भी सीमा तक जा सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं, अत: प्रतीक्षा की जानी चाहिए कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था संसद का सत्ता की तीसरी पारी के लिए चुनावी मंच की तरह इस्तेमाल करने के बाद मोदी दो दिन बाद (पंद्रह अगस्त को) लाल किले की प्राचीर का उपयोग अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी संबोधन में किन घोषणाओं के लिए करते हैं!
(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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नूंह में हिंसा के बाद फिर निकलेगी ब्रजमंडल यात्रा

हरियाणा के नूंह में फिर ब्रजमंडल यात्रा निकालने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए 28 अगस्त का दिन तय किया गया है। हालांकि प्रशासन से बातचीत के बाद तारीख आगे-पीछे भी की जा सकती है। यह फैसला रविवार को पलवल में हुई हिंदू महापंचायत में लिया गया। 31 जुलाई को इसी यात्रा के दौरान जमकर हिंसा और आगजनी हुई थी, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा दंगों की जांच एनआईए से करवाने, नूंह में बसे रोहिंग्या को बाहर निकालने और फिरोजपुर झिरका से कांग्रेस विधायक मामन खान को भी तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की गई। पलवल में हुई सर्वजातीय हिंदू महापंचायत की अध्यक्षता मेवात के 40 हिन्दू पाल और 12 मुस्लिम पाल के अध्यक्ष चौधरी अरुण जैलदार ने की। महापंचायत में हजारों की संख्या में हिन्दू समाज के लोग पहुंचे हैं, वहीं इस महापंचायत में हरियाणा गोरक्षा दल के उपाध्यक्ष आचार्य आजाद, सोहना के विधायक संजयसिंह, पलवल के पूर्व विधायक सुभाष चौधरी भी शामिल हुए।

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हिमाचल के सोलन में बादल फटा, शिमला में लैंडस्लाइड

शिव मंदिर ढहा: श्रद्धालु दबे, 9 शव निकाले……………………………

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में दो दिनों से भारी बारिश हो रही है। हिमाचल के सोलन में सोमवार को बादल फटने से 7 लोगों की मौत हो गई। जादोन गांव में देर रात हुई इस घटना में दो घर बह गए, जिसमें 3 लोगों के लापता होने की खबर है। इसके अलावा शिमला के बालूगंज में सोमवार सुबह 7:30 बजे लैंडस्लाइड हुई। यहां पहाड़ का मलबा शिव बावड़ी मंदिर पर जा गिरा। इस दौरान मंदिर में पूजा कर रहे 25 से 30 श्रद्धालु मलबे में दब गए। समाचार लिखे जाने तक 9 शव निकाले जा चुके थे। शिमला एसपी संजीव गांधी ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया- शिव बावड़ी मंदिर में कई लोग फंसे हुए हैं। लोगों को निकालने के लिए रेस्क्यू आॅपरेशन चलाया जा रहा है। आसपास की बिल्डिंग को भी खाली कराया गया है। इनके भी गिरने का खतरा है। उधर उत्तराखंड के मालदेवता में लगातार बारिश के बीच देहरादून डिफेंस कॉलेज बिल्डिंग पूरी तरह ढह गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह बिल्डिंग 100 साल पुरानी बताई जा रही है। हिमाचल के मंडी जिले की बल्ह घाटी में तेज बारिश के कारण बाढ़ जैसी स्थिति बनी हुई है। ब्यास नदी उफान पर है। अधिकारियों के मुताबिक कई पर्यटक फंसे हुए हैं। प्रशासन के मुताबिक… राज्य में पिछले दो दिनों में 30 से ज्यादा घर पूरी तरह और 180 घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। इस दौरान लगभग 140 गोशालाएं, दुकानें व घाट भी क्षतिग्रस्त हुए हैं।
उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे बंद- उत्तराखंड में भी पिछले दो दिनों से लगातार बारिश हो रही है। यहां मंदाकिनी समेत कई नदियां उफान पर हैं। प्रशासन के मुताबिक… मंदाकिनी नदी में बाढ़ की वजह से सड़क बह गई। इसकी वजह से चमोली जिले में बांसवाड़ा गांव के पास रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे बंद हो गया।

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