FCRA संशोधन विधेयक जेपीसी के पास भेजा गया, 31 सदस्यीय समिति करेगी जांच
नई दिल्ली: विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 को संसद की संयुक्त समिति (JPC) के पास भेजने का प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो गया। केंद्रीय राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने यह प्रस्ताव पेश किया। प्रस्तावित समिति में कुल 31 सदस्य होंगे, जिनमें 21 लोकसभा और 10 राज्यसभा के सदस्य शामिल होंगे।
जेपीसी को विधेयक के प्रावधानों की विस्तृत जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है। समिति को संसद के 2026 के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।
विपक्ष ने बिल वापस लेने की मांग की
विधेयक को लेकर विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा और इसे वापस लेने की मांग की। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार अल्पसंख्यकों और एनजीओ को निशाना बनाने की कोशिश कर रही है।
इस पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि विपक्ष की ओर से ही लंबे समय से विधेयक को जेपीसी के पास भेजने की मांग की जा रही थी। उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष को विधेयक के किसी प्रावधान पर आपत्ति है, तो वह जेपीसी के समक्ष अपनी बात रख सकता है।
रिजिजू ने स्पष्ट किया कि विधेयक का उद्देश्य किसी अल्पसंख्यक वर्ग को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विदेशी धन के नियमन से जुड़े नियमों को मजबूत करना है।
अखिलेश यादव ने भी किया विरोध
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी विधेयक का विरोध किया। उन्होंने सरकार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानून लाने का आरोप लगाया।
वहीं, रिजिजू ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो किसी अल्पसंख्यक वर्ग के खिलाफ हो।
विपक्ष के विरोध और सरकार के जवाब के बीच लोकसभा ने ‘विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
केंद्र सरकार ने SC-ST में क्रीमी लेयर का विरोध क्यों किया?
केंद्र सरकार का सबसे बड़ा तर्क है कि SC-ST और OBC की सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए दोनों के लिए एक जैसी आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती।
सरकार के मुताबिक, SC समुदाय को ऐतिहासिक रूप से छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है। वहीं, ST समुदाय की पहचान अलग संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन से जुड़ी रही है। दूसरी ओर, OBC की पहचान मुख्य रूप से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर होती है।
केंद्र का कहना है कि SC-ST आरक्षण का उद्देश्य सिर्फ आर्थिक असमानता कम करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय, सामाजिक भेदभाव और असमानता को दूर करना भी है। इन समुदायों के साथ होने वाला भेदभाव उनकी मौजूदा आर्थिक स्थिति से अलग भी हो सकता है। ऐसे में सरकार का तर्क है कि OBC में लागू क्रीमी लेयर के सिद्धांत को SC-ST पर उसी तरीके से लागू करना उचित नहीं होगा।
सिर्फ आय के आधार पर आरक्षण का लाभ तय नहीं किया जा सकता
केंद्र सरकार ने कहा है कि आरक्षण नीति में किसी बड़े बदलाव से पहले व्यापक समीक्षा और ठोस अनुभवजन्य अध्ययन जरूरी है।
खासकर अगर आरक्षित वर्गों के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता तय करने की बात है, तो इसके लिए संबंधित समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति से जुड़े विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत होगी।
सरकार का कहना है कि सिर्फ आय को आधार बनाकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति या परिवार को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए या नहीं।
आरक्षण नीति बनाने का अधिकार किसके पास है?
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी दलील दी है कि आरक्षण नीति तय करना मुख्य रूप से कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।
सरकार के मुताबिक, अदालत सरकार को किसी खास तरीके से आरक्षण नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकती। अगर आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित प्राथमिकता लागू करनी है तो इसके लिए व्यापक समीक्षा, सामाजिक-आर्थिक आंकड़े और उचित कानूनी आधार जरूरी होगा।
केंद्र ने पुराने न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल इसलिए सरकार को किसी नीति को लागू करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई दूसरा विकल्प अधिक बेहतर या निष्पक्ष नजर आता है। सरकार का तर्क है कि न्यायपालिका विधायिका की जगह लेकर सार्वजनिक नीति तय नहीं कर सकती।
केंद्र ने SC-ST क्रीमी लेयर वाली याचिकाओं पर क्या कहा?
केंद्र सरकार ने इन जनहित याचिकाओं की सुनवाई पर भी सवाल उठाए हैं। सरकार का कहना है कि याचिकाओं में संविधान के तहत दिए गए किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का स्पष्ट आधार सामने नहीं आता।
इसी वजह से केंद्र ने दलील दी है कि ये याचिकाएं अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई योग्य नहीं हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से इन याचिकाओं को खारिज करने का अनुरोध किया है।
SC-ST की सूची में बदलाव कौन कर सकता है?
केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का भी हवाला दिया है। इन्हीं प्रावधानों के तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूची तय होती है।
सरकार के अनुसार, SC या ST की सूची में किसी जाति या जनजाति को शामिल करने या बाहर करने का अधिकार संसद को कानून के जरिए है। राज्य सरकार, अदालत, न्यायाधिकरण या कोई अन्य प्राधिकरण अपने स्तर पर इन सूचियों में बदलाव नहीं कर सकता।
अब समझें- क्रीमी लेयर क्या होती है?
क्रीमी लेयर की अवधारणा 1992 के मंडल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ी है।
इसका मूल विचार यह है कि किसी पिछड़े वर्ग के भीतर जो लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत आगे निकल चुके हैं, उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाए, ताकि आरक्षण का फायदा उस वर्ग के ज्यादा जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सके।
यानी सवाल यह है कि अगर किसी आरक्षित वर्ग के कुछ परिवार लगातार शिक्षा, नौकरी और आर्थिक स्थिति में काफी आगे बढ़ चुके हैं, तो क्या उन्हें भी आरक्षण का लाभ लगातार मिलता रहना चाहिए? इसी सोच से OBC में क्रीमी लेयर की व्यवस्था विकसित हुई।
OBC में क्रीमी लेयर कैसे तय होती है?
OBC में क्रीमी लेयर की व्यवस्था 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन से जुड़ी है। इसके तहत OBC के भीतर सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके वर्गों की पहचान के लिए अलग-अलग मानदंड तय किए गए।
इसमें उच्च सरकारी पदों पर कार्यरत माता-पिता के बच्चों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान किया गया। ग्रुप-A और कुछ ग्रुप-B पदों को सामाजिक उन्नति का संकेत माना गया।
इसके अलावा कुछ मामलों में आय और संपत्ति को भी अतिरिक्त आधार बनाया गया। खासकर उन परिस्थितियों में जहां संबंधित पदों की सरकारी पदों से समानता निर्धारित नहीं की गई थी।
2004 में क्रीमी लेयर पर क्या स्पष्टीकरण आया?
सरकार ने 14 अक्टूबर 2004 को क्रीमी लेयर को लेकर एक स्पष्टीकरण जारी किया था। यह उन मामलों से संबंधित था, जहां माता-पिता ऐसी संस्थाओं में काम करते थे जिनके पदों की सरकारी पदों से बराबरी निर्धारित नहीं थी।
इसमें कहा गया कि वेतन से होने वाली आय और अन्य स्रोतों से होने वाली आय को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। अगर इनमें से किसी एक श्रेणी की आय लगातार तीन वर्षों तक निर्धारित सीमा से अधिक रहती है, तो संबंधित परिवार को क्रीमी लेयर के दायरे में माना जा सकता है।
OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला क्या था?
सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण से जुड़े एक मामले में कहा था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण सिर्फ माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि माता-पिता की नौकरी की स्थिति और उनके पद की श्रेणी जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।
यह मामला केंद्र सरकार की उन अपीलों से जुड़ा था, जिनमें कुछ OBC उम्मीदवारों को सिविल सेवा परीक्षा में आरक्षण से संबंधित राहत मिली थी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और हाईकोर्ट ने माना था कि सिर्फ माता-पिता की वेतन आय निर्धारित सीमा से अधिक होने के आधार पर किसी OBC उम्मीदवार को आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकता।
OBC क्रीमी लेयर की आय सीमा कितनी है?
केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि OBC की नॉन-क्रीमी लेयर की सालाना आय सीमा 2017 में 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई थी।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने इसके संबंध में 13 सितंबर 2017 को आदेश जारी किया था।
सरकार के मुताबिक, फिलहाल इस आय सीमा को बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
सबसे अहम बात
मौजूदा व्यवस्था में क्रीमी लेयर का सिद्धांत OBC आरक्षण पर लागू है। SC और ST आरक्षण में इसे लागू करने की मांग सुप्रीम कोर्ट के सामने है, लेकिन केंद्र सरकार इसका विरोध कर रही है।
केंद्र का तर्क है कि SC-ST का आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और वंचना से जुड़ा है, इसलिए इसे केवल आय के पैमाने पर तय करना उचित नहीं होगा। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह तय होगा कि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर के सवाल पर आगे क्या कानूनी रास्ता निकलता है।
Parliament Monsoon Session 2026 Live: ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक राज्यसभा से पास, INDIA ब्लॉक का वॉकआउट; लोकसभा कल तक स्थगित
संसद के मानसून सत्र का आज 17वां दिन है। विपक्ष दिल्ली में छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री से जवाब और राम मंदिर से जुड़े मुद्दे पर चर्चा की मांग कर रहा है। हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही बुधवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई है। वहीं, राज्यसभा में ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक पर चर्चा के बाद इसे पारित कर दिया गया। इस दौरान विपक्षी INDIA ब्लॉक के सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया।
ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक 2026 राज्यसभा से पारित
ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 राज्यसभा से भी पारित हो गया। इससे पहले लोकसभा में भी विधेयक को मंजूरी मिल चुकी है।
विधेयक में देश के विभिन्न ट्रिब्यूनलों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन (NTC) गठित करने का प्रावधान किया गया है।
विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी INDIA ब्लॉक के सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को सभापति की ओर से बोलने की अनुमति नहीं मिलने के बाद विपक्षी सांसदों ने यह कदम उठाया।
केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल लोगों को तेजी से न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2016 में ट्रिब्यूनलों के युक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू की थी और इसके बाद 2021 में ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम लाया गया।
मेघवाल के मुताबिक, नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन इस विधेयक का मुख्य आधार है। आयोग में दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य होंगे। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश या हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी। सरकार का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी, स्वतंत्र और योग्यता आधारित बनाने की कोशिश की गई है।
INDIA ब्लॉक के सांसदों ने राज्यसभा से किया वॉकआउट
ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक पर चर्चा के दौरान INDIA ब्लॉक के सांसदों ने राज्यसभा से वॉकआउट किया। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को बोलने की अनुमति नहीं मिलने के बाद विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी शुरू कर दी।
इससे पहले भी विपक्षी दल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से प्रदर्शनकारी छात्रों पर कथित बल प्रयोग और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सदन में बयान देने की मांग कर रहे थे। इसके अलावा राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी का मुद्दा भी विपक्ष लगातार उठा रहा है।
इन मुद्दों को लेकर सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी। दोपहर बाद कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक पर चर्चा शुरू हुई, लेकिन विपक्षी सांसदों की नारेबाजी जारी रही।
सभापति ने सांसदों से केवल विधेयक से जुड़े मुद्दों पर बोलने को कहा। इसके बाद विपक्षी सांसदों ने ‘एलओपी को बोलने दो’ के नारे लगाए। हंगामे के बीच विपक्षी सांसदों ने सदन की व्यवस्था का मुद्दा भी उठाने की कोशिश की।
‘देश के लोगों के भरोसे से जुड़ा है ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक’: स्वाति मालीवाल
विधेयक के समर्थन में सांसद स्वाति मालीवाल ने कहा कि यह कानून आम नागरिक के न्याय के इंतजार से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ ट्रिब्यूनलों से संबंधित विधेयक नहीं है, बल्कि देश के लोगों के न्याय और व्यवस्था पर भरोसे से जुड़ा महत्वपूर्ण विधेयक है।
कानून मंत्री ने राज्यसभा में पेश किया विधेयक
केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 पेश किया और इसे विचार एवं पारित करने के लिए सदन के सामने रखा।
विधेयक पर चर्चा के दौरान एआईएडीएमके सांसद आईएस इनबादुरई ने कावेरी नदी से जुड़े मुद्दे को उठाया और केंद्र सरकार से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।
लोकसभा की कार्यवाही कल तक स्थगित
विपक्षी सांसदों की नारेबाजी और हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही बुधवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।
केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 लोकसभा से पारित
केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 लोकसभा से पारित हो गया। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि केरल के वरिष्ठ नेताओं ने इस मौके पर अपनी बात सदन में नहीं रखी।
PM Modi Insta Video: पीएम मोदी की देशवासियों से अपील- ‘हर घर तिरंगा’ को बनाएं उत्सव, हर दिल में जगाएं देशभक्ति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक नया वीडियो संदेश साझा कर देशवासियों से ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हर घर का उत्सव बनाने की अपील की है। 15 अगस्त से पहले जारी इस संदेश में पीएम मोदी ने लोगों से तिरंगा फहराने, स्वतंत्रता संग्राम के वीरों को नमन करने और विकसित भारत के निर्माण का संकल्प लेने का आह्वान किया।
15 अगस्त को लेकर पीएम मोदी ने क्या कहा?
पीएम मोदी ने अपने वीडियो संदेश में देशवासियों से स्वतंत्रता दिवस को गर्व, सम्मान और उत्साह के साथ मनाने की अपील की। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के बलिदान को याद करते हुए देश की प्रगति में योगदान देने का संकल्प लेने की बात कही।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि हर घर में तिरंगा और हर दिल में तिरंगा होना चाहिए। उन्होंने देशवासियों से अपने-अपने घरों पर तिरंगा फहराकर आजादी के पर्व को उत्सव के रूप में मनाने का आग्रह किया।
क्या है ‘हर घर तिरंगा’ अभियान?
‘हर घर तिरंगा’ अभियान का उद्देश्य देशवासियों को राष्ट्रीय ध्वज से भावनात्मक रूप से जोड़ना और तिरंगे के प्रति सम्मान, गर्व और राष्ट्रभावना को मजबूत करना है।
अभियान के तहत लोगों को अपने घरों के साथ-साथ दुकानों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर भी तिरंगा फहराने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। देशभर में विभिन्न सरकारी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों की ओर से तिरंगा यात्राएं, सामूहिक ध्वजारोहण और दूसरे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
कब शुरू हुआ था ‘हर घर तिरंगा’ अभियान?
‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरुआत ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के दौरान की गई थी। इसके बाद हर साल स्वतंत्रता दिवस के आसपास इस अभियान को बड़े स्तर पर चलाया जाता है।
2026 में भी अभियान के तहत लोगों को अपने घर की बालकनी, छत या मुख्य द्वार पर तिरंगा फहराने और आसपास के लोगों के साथ मिलकर आजादी का पर्व मनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
पीएम मोदी के संदेश का क्या है मकसद?
पीएम मोदी का यह संदेश सिर्फ तिरंगा फहराने की अपील तक सीमित नहीं है। इसके जरिए लोगों में राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान, स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति कृतज्ञता और देश के विकास में भागीदारी की भावना को मजबूत करने का संदेश दिया गया है।
15 अगस्त के मौके पर ‘हर घर तिरंगा’ के जरिए सरकार देशभर में देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है।
मोदी का वीडियो हटाने पर Meta से सरकार की दो टूक, ‘भारत में भारतीय कानून ही चलेंगे’
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हटाए जाने का विवाद अभी थमा नहीं है। वीडियो हटाने पर माफी मांगने के बाद अब Meta की ग्लोबल टीम और केंद्र सरकार के बीच बातचीत का दौर तेज हो गया है।
सरकार ने साफ संदेश दिया है कि भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अमेरिकी नियमों के आधार पर नहीं, बल्कि भारतीय कानूनों के मुताबिक ही काम करना होगा।
अश्विनी वैष्णव से Meta की ग्लोबल टीम की मुलाकात
Meta की ग्लोबल टीम ने गुरुवार को नई दिल्ली में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण/इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात की। बैठक में किन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई, इसकी आधिकारिक जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है।
हालांकि, सूत्रों के मुताबिक Meta की ग्लोबल टीम अगले तीन से चार दिनों तक भारत में रह सकती है। इस दौरान सरकारी अधिकारियों के साथ कई दौर की बैठकें होने की संभावना है। बातचीत में WhatsApp से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है।
सरकार ने Meta से मांगी सिस्टम की जानकारी
सरकार Meta से उसके एल्गोरिदम, कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम, भारतीय कानूनों के अनुपालन की प्रक्रिया, चेक एंड बैलेंस और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी जानकारी मांग रही है।
खास तौर पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट (CSAM) और डीपफेक कंटेंट से निपटने के लिए Meta किस तरह के सिस्टम और तकनीक का इस्तेमाल करता है, इसकी जानकारी भी मांगी जा रही है।
‘भारत में अमेरिकी कानून के हिसाब से नहीं चलेगा प्लेटफॉर्म’
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अमेरिकी कानूनों के आधार पर संचालित नहीं किया जा सकता।
सरकार का कहना है कि ये तकनीकी और संवेदनशील मामले हैं, इसलिए इनके हर पहलू को समझना जरूरी है। साथ ही, दूसरे संस्थानों की तरह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की भी समाज और देश के कानूनों के प्रति जिम्मेदारी है।
Meta की टेक्निकल टीम से भी जारी रहेगी बातचीत
अश्विनी वैष्णव की Meta की ग्लोबल टीम के साथ बैठक के बाद मंत्रालय के अधिकारी कंपनी की टेक्निकल टीम के साथ बातचीत जारी रखेंगे।
सूत्रों के मुताबिक, Meta सार्वजनिक तौर पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका है, लेकिन अभी टेक्निकल डिटेल्स और लॉग्स से जुड़े कई सवालों पर चर्चा बाकी है।
सरकार सिर्फ Meta तक सीमित नहीं है। X और Telegram समेत दूसरे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ भी लगातार बातचीत जारी है।
यानी मोदी के वीडियो से शुरू हुआ विवाद अब सिर्फ एक पोस्ट हटाने तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और भारतीय कानूनों के पालन को लेकर सरकार और टेक कंपनियों के बीच बड़े टकराव की जमीन तैयार करता नजर आ रहा है।