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Bhajanlal Sharma new CM Rajasthan: राजस्थान के अगले सीएम होंगे भजनलाल शर्मा, विधायक दल की बैठक में एलान

राजस्थान के नए सीएम भजनलाल शर्मा होंगे। विधायक दल की बैठक में उनके नाम का एलान किया गया।

Rajasthan CM: राजस्थान को नया मुख्यमंत्री मिल गया है. भाजपा ने भजनलाल शर्मा को राज्य की कमान सौंपी है. छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की तरह भाजपा ने राजस्थान में भी सीएम पद के लिए अपने फैसले से सभी को चौंका दिया. यहां भी सियासी पंडितों के सारे अनुमान धरे के धरे रह गए.

राजस्थान में नए मुख्यमंत्री के लिए विधायक दल की बैठक शुरू हो चुकी है। अब से थोड़ी ही देर बाद कौन होगा राजस्थान का मुख्यमंत्री इसका खुलासा हो जाएगा। वहीं, नाम का एलान होने के बाद शाम 4.30 बजे राज्यपाल कलराज मिश्र से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे।

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Mohan Yadav becomes the next CM of MP : मध्यप्रदेश को मिला नया मुखिया, सीएम पद के लिए मोहन यादव के नाम का हुआ ऐलान

Mohan Yadav becomes the next CM of MP : भोपाल। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। बीजेपी प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रही है लेकिन मतगणना दिन यानि 03 दिसंबर से ही सीएम किसे बनाया जाए इस बात पर सस्पेंस बना हुआ था। सीएम को लेकर लगातार दिल्ली में मंथन और बैठकों का दौर भी चला। हालांकि आज मध्यप्रदेश की प्रजा को अपना मुखिया मिल गया है। शाम 4 बजे भोपाल में विधायक दल की बैठक शुरू हुई जिसमें नए सीएम का ऐलान हो चुका है। बीजेपी ​के विधायकों ने सीएम चुन लिया है।

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बड़बोलापन रहा कांग्रेस की हार का कारण!

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम एग्जिट पोल के विपरीत भाजपा के पक्ष में गए है। तेलंगाना में सत्ता हासिल करने व छत्तीसगढ़ में संतोषजनक टक्कर देने के अलावा कांग्रेस राजस्थान व मध्यप्रदेश में बेअसर ही रही। चुनाव में जातीय जनगणना का मुद्दा जहां उसे ले डूबा वही राजस्थान में गहलोत-पायलट टकराव, मध्यप्रदेश में कमलनाथ व दिग्विजय का बड़बोलापन कांग्रेस की हार का कारण बना है। राजस्थान राज्य में 9 बड़े कारण कांग्रेस की हार के बने हैं।
पहला तो यही कि राजस्थान में रिवाज कायम रहा है जनता ने हमेशा सत्ता में बदलाव किया है। वहीं कांग्रेस की मुफ्त की रेवड़ी नहीं चली। कांग्रेस को गहलोत-पायलट विवाद महंगा पड़ गया। कन्हैयालाल हत्याकांड से चुनावी ध्रुवीाकरण हुआ है। कांग्रेस चुनाव के कुछ महीने पहले तक गुटबाजी से जूझती नजर आई। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की खींचतान का भी कार्यकर्ताओं पर प्रतिकूल असर पड़ा, जनता के बीच गलत संदेश गया है। भले ही चुनाव से ठीक पहले दोनों ही नेता हम साथ-साथ हैं का संदेश देते नजर आए हों लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कांग्रेस जहां गुटबाजी से जूझती रही, वहीं बीजेपी ने अंतर्कलह को कहीं बेहतर तरीके से हैंडल करती रही। बीजेपी ने गुटबाजी से पार पाने के लिए वसुंधरा राजे को न सिर्फ सीएम फेस घोषित करने से परहेज किया, बल्कि बड़े नेताओं को चुनाव मैदान में उतार दिया था। नतीजा ये हुआ कि नेताओं ने अपनी साख बचाने के लिए उस सीट पर जोर लगाया और इसका सकारात्मक असर आसपास की सीटों पर भी पड़ा। राजस्थान का चुनाव मोदी बनाम गहलोत हो जाना भी कांग्रेस को भारी पड़ा है।
पीएम मोदी के चेहरे ने कांग्रेस के जातिगत जनगणना के दांव की धार भी कुंद कर दी है। पीएम मोदी ने राजस्थान में ताबड़तोड़ चुनावी रैलियां कीं, वहीं कांग्रेस की ओर से प्रचार का भार सीएम गहलोत के कंधों पर अधिक नजर आया। चुनाव प्रचार के लिए राहुल गांधी मैदान में उतरे तो लेकिन वह भी महज खानापूर्ति ही रही। चुनाव पूरी तरह से मोदी बनाम गहलोत हो गया और इसका लाभ भी बीजेपी को मिला। अशोक गहलोत की सरकार ने चुनावी साल में एक के बाद एक चुनावी दांव चले, जिनमें चिरंजीवी योजना के तहत हेल्थ इंश्योरेंस की लिमिट बढ़ाकर 50 लाख रुपए करने का वादा किया गया, सस्ते गैस सिलेंडर समेत कई लुभावनी योजनाओं पर पेपर लीक, लाल डायरी और भ्रष्टाचार के आरोप भारी पड़े। कांग्रेस की हार के पीछे बागी भी बड़ी वजह माने जा रहे हैं। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद कई नेताओं ने पार्टी से बगावत कर बतौर निर्दलीय उम्मीदवार ताल ठोंक दी। कुछ बीजेपी और दूसरे दलों के टिकट पर भी मैदान में उतर गए।
इन बागियों ने भी कांग्रेस का नुकसान किया है। इसके ठीक उलट बीजेपी ने एक-एक बागी को मनाने के लिए बड़े नेताओं को जिम्मेदारी दी और उनको मनाने की पूरी कोशिश की। कई बागी मान भी गए और बीजेपी को इसका लाभ मिला है। वहीं मध्यप्रदेश की राजनीति में यह चुनाव परिणाम लंबे समय तक याद रखा जाएगा। इस परिणाम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर कांग्रेस जो जीत की जोरदार ताल ठोंक रही थी, उसे इतनी बुरी हार कैसे मिली? कारण चौंकाने वाले हैं, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ इन तीनों राज्यों में चुनाव के परिणाम पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष मे रहे हैं। प्रचंड जीत की ओर जाते हुए बीजेपी के प्रदेश कार्यालयों में ढोल ढमाके बज रहे हैं, लड्डू बंट रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के खेमे में मायूसी है। जो लड्डू कांग्रेस कार्यालय में आए थे, वे वैसे ही रखे हुए हैं। सवाल यह है कि जो कांग्रेस 2019 में बहुमत के आंकड़े तक पहुंच गई थी, वो ऐसा क्या हुआ कि 2023 के चुनाव परिणाम के रुझानों में अब तक बुरी तरह हार की कगार पर है। जिसका कारण एंटी इंकंबेंसी का कोई रोल नहीं रहा। बीजेपी एंटी इंकंबेंसी को नकारकर जीती है। राजनीति में यह शोध का विषय होना चाहिए। क्योंकि 18 साल बाद भी एक चुनाव होता है और किसी पार्टी को प्रचंड जीत मिलती है, वो भी 18 साल तक शासन में रहने के बाद। जबकि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी सत्ता से चली गई पर 15 महीनों को छोड़कर एमपी में नहीं। दिग्गी कमलनाथ ने किसी को नहीं बढ़ने दिया।
कांग्रेस ने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से बड़ा नेता किसी को नहीं बनने दिया। दोनों नेता वयोवृद्ध हैं। कमलनाथ की उम्र 77 साल और दिग्विजय सिंह की उम्र 76 साल है। यूथ लीडर्स का कोई बैकअप नहीं ,किसी यूथ लीडर को आने नहीं दिया। ​ज्योतिरादित्य सिंधिया जो कांग्रेस में एक बड़ा कद थे। युवा थे, उन्हें भी दरकिनार कर दिया गया था। मजबूरन उन्हें बीजेपी का दामन थामना पड़ा। मध्यप्रदेश कांग्रेस में युवा नेतृत्व का बैकअप में नहीं बन पाया। केवल विक्रांत भूरिया यूथ कांग्रेस अध्यक्ष हंै, जो कां​तिलाल भूरिया के बेटे हैं और पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर हैं। उन पर भी वरिष्ठ कांग्रेसी और पूर्व मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की छाप है। कमलनाथ का अड़ियल रवैया, सबसे अहम बिंदु राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह है कि कमलनाथ में राजनीतिक नेतृत्व करने की क्षमता नहीं है, वो राजनेता कम और बड़ी कंपनी मैनेजर ज्यादा लगते हैं। वो राजनीतिक बैठकों में कॉर्पोरेट मीटिंग जैसा व्यवहार करते रहे हैं। कमलनाथ मिनटों के हिसाब से विधायकों को मिलने का समय देते थे। वो कहते थे चलो चलो , उन्हें जनता ने चलता कर दिया।
कमलनाथ की छवि पर भारी शिवराज की छवि : कांग्रेस में जहां कमलनाथ का रवैया तानाशाही रहा है, वहीं दूसरी ओर बीजेपी इसलिए आगे निकली कि एमपी के सीएम शिवराज जमीनी नेता हैं, वे लोगों और विधायकों की सुनते भी हैं, बोलते भी हैं। शिवराज की सरल छवि कमलनाथ की छवि पर भारी पड़ी है। कांग्रेस को अब सोचना होगा कि घिसे पिटे नेताओं पर भरोसा करने के बजाए नए बेदाग छवि के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को आगे लाए, तभी कांग्रेस में कुछ जान आ सकती है।
(लेखक राजीनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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आलमी तब्लीगी इज्तिमा के आखिर दिन हुई दुआ-ए-खास

ईंटखेड़ी में चल रहे आलमी तब्लीगी इज्तिमा का आज सोमवार को समापन हो गया। इज्तिमागाह पर पहले तीन दिन 7 लाख से ज्यादा लोग पहुंचे, आखिरी दिन दुआ-ए-खास के वक्त लगभग 10 लाख लोग शामिल हुए। रविवार रात तक लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। भोपाल पहुंचने वाली ट्रेनों में भीड़ देखी गई। बस और अन्य वाहनों से भी लोग यहां पहुंचे हैं। मध्यप्रदेश के आसपास के जिलों से लोग निजी वाहनों से भी आए हैं। आयोजन स्थल पर बनाई गई 65 से अधिक पार्किंग फुल हो गई। पुलिस ने सोमवार की भीड़ को देखते हुए एक दिन पहले बड़े वाहनों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। दूसरी ओर, रेलवे स्टेशन से लेकर ईंटखेड़ी तक इज्तिमा कमेटी के वॉलेंटियर्स ट्रैफिक मैनेजमेंट की जिम्मेदारी संभालते रहे।
सुबह 9 बजे हुई दुआ-ए-खास- इज्तिमा मीडिया प्रभारी मोहम्मद आरिफ खान ने बताया कि दुआ के लिए सोमवार सुबह 9 बजे का वक्त तय किया था। सुबह फजर की नमाज के बाद मौलाना सआद साहब का खास बयान हुआ। इस दौरान उन्होंने जमातों में निकलने वाले लोगों को इस सफर में अपनाए जाने वाले अखलाक, रखे जाने वाले ख्याल और किए जाने वाले काम पर समझाइश दी। दुआ के बाद लोग इज्तिमागाह से रवाना होना शुरू हो गए। यहां से शाम तक लगभग 2 हजार जमातें देशभर के लिए निकलेंगी।
इज्तिमागाह ​​​ग्रीन, क्लीन और डस्ट फ्री रहा- आमतौर पर बड़े मजमों में गंदगी, धूल, दुर्गंध और यहां-वहां फैले कचरे के अंबार दिखाई देते हैं। लेकिन, पूरा इज्तिमागाह ​​ग्रीन, क्लीन और डस्ट फ्री रहा। इज्तिमा गाह की मिट्‌टी पर बड़ी तादाद में लोगों की चहल-पहल से उड़ने वाले धूल के गुबार रोकने के लिए हर 4 घंटे में स्प्रिंकलर से पानी का छिड़काव किया जाता रहा। इज्तिमा शुरू होने से कई दिन पहले ये प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी, जो आयोजन के दौरान भी सतत जारी रही।
रेलवे ने कहा- यूटीएस एप से खरीदें जनरल टिकट- ​​​​​​​इज्तिमा से लौटने वाले लोगों को टिकट खरीदने के लिए लाइन में लगने से बचने के लिए रेलवे ने यूटीएस (अनरिजर्व टिकट सिस्टम) ऐप यूज करने की सलाह दी। जिसमें बताया गया कि इस एप के माध्यम से लाइन में लगकर टिकट लेने की जरूरत नहीं होती। वे सीधे एप से जनरल टिकट प्राप्त कर सकते हैं। वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक सौरभ कटारिया ने अनारक्षित टिकट लेकर यात्रा करने वाले यात्रियों से अपील की है कि वे मोबाइल टिकटिंग ऐप पर यूटीएस के उपयोग को बढ़ावा दें, और उपयोग से जुड़े हितों का लाभ उठाएं। किसी भी ऐप स्टोर से ऐप डाउनलोड करें। ऐप पर रजिस्ट्रेशन के लिए साइन अप करें। और टिकट बुक करें।

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लोक अदालत में तय था 25 का लक्ष्य, 15 करोड़ की हुई वसूली

राजस्व वसूली बढ़ाने की जरूरत है। लेकिन राजस्व शाखा के अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही से जोन स्तर पर कम बकाया करों की वसूली नहीं हो पा रही है। लोक अदालत के दौरान शनिवार को नगर निगम के कार्यालयों में राजस्व वसूली के लिए शिविर लगाए गए थे, इसमें बकायादारों को संपत्तिकर और जलकर समेत अन्य करों को जमा करने में छूट भी दी जा रही थी। लेकिन प्रचार-प्रसार नहीं होने से निगम लक्ष्य के अनुसार 60 प्रतिशत राशि भी नहीं वसूल पाया। इसका कारण 21 में से 11 जोन में वसूली कम होना है।
निगम अधिकारियों ने लोक अदालत में वसूली के लिए 25 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा था, लेकिन इसमें मात्र 15 करोड़ रुपये ही वसूली हुई। जो लक्ष्य का 59.66 प्रतिशत है। इसमें भी पांच जोन ऐसे रहे, जहां 31 से 49 प्रतिशत ही वसूली हो सकी। निगम के राजस्व विभाग के अनुसार एक दिन में 13 हजार 747 लोगों से टैक्स वसूला गया। जबकि बड़े बकायादारों को वसूली के लिए नोटिस थमाए गए हैं। यह बकायादार समय पर कर जमा नहीं करेंगे तो इनकी संपत्तियों को कुर्क करने सहित नल कनेक्शन काटने की कार्रवाई होगी।
वसूली में पिछड़े यह जोन- सबसे कम वसूली में एक नंबर पर जोन एक रहा। जोन एक को सवा करोड़ रुपये वसूली का लक्ष्य दिया था। लेकिन 655 बकायादारों से 39 लाख 9 हजार रुपए ही वसूल सका। दूसरे नंबर पर जोन 16 रहा। जोन को ढाई करोड़ वसूलना थे, 94 लाख 97 हजार रुपए वसूल किए। तीसरे नंबर पर जोन 17 रहा। डेढ़ करोड़ रुपए वसूलना थे, 68 लाख 75 हजार वसूले। जोन 14 में भी वसूली का 46.75 प्रतिशत आया और पांचवे नंबर पर जोन 18 रहा। यहां 49.77 प्रतिशत

वसूली से तय होगी परफार्मेंस
लगातार कम वसूली को देखते हुए नगर निगम प्रशासन जोन के जोनल अधिकारी और वार्ड प्रभारियों की सूची तैयार कर रहा है। बताया जा रहा है कि जो हर बार लक्ष्य पूरा नहीं करते, उन्हें राजस्व मुख्यालय अटैच किया जा सकता है।
वहीं पीईबी से चयनित होकर आए नए कर्मचारी-अधिकारियों को जोन और वार्ड का जिम्मा देने की तैयारी है। यह भी बताया गया कि अभी एलडीसी और दूसरे कर्मचारियों को जोनल अधिकारी का प्रभार दिया गया है।

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