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मुंबई में पीएम करेंगे सी-ब्रिज अटल सेतु का उद्घाटन

मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (शुक्रवार को) देश के सबसे लंबे सी-ब्रिज अटल सेतु का उद्घाटन करेंगे। यह ब्रिज मुंबई से नवी मुंबई को जोड़ेगा। इससे दो घंटे की दूरी 20 मिनट में पूरी होगी। दिसंबर-2016 में मोदी ने इस पुल की आधारशिला रखी थी। पुल की कुल लागत 17 हजार 843 करोड़ रुपए है। 21.8 किलोमीटर लंबे सिक्स लेने वाले ब्रिज को मुंबई ट्रांस हार्बर सी-लिंक भी कहा जाता है। पुल का 16.5 किलोमीटर का हिस्सा समुद्र पर है, जबकि 5.5 किलोमीटर का हिस्सा जमीन पर है। इस पुल की क्षमता रोजाना 70 हजार वाहनों की है। फिलहाल ब्रिज से रोज करीब 50 हजार वाहनों के गुजरने का अनुमान है। टळऌछ की वेबसाइट के मुताबिक… पुल के उपयोग से हर साल एक करोड़ लीटर ईंधन की बचत होने का अनुमान है।

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चीन की गोद में बैठे मालदीव से विवाद बहुत पुराना है

भारत-मालदीव के बीच बिगड़ते राजनयिक रिश्तों के बीच अब दोनों देशों के बीच पुराने मैत्रीपूर्ण रिश्तों की पड़ताल होने लगी है, जो मुइज्जू के शासन से छह दशक पुराना है। 1965 में जब मालदीव को अंग्रेजी उपनिवेश से आजादी मिली तो भारत ऐसा पहला देश था, जिसने उसे एक स्वतंत्र देश का दर्जा दिया था। 1980 में भारत ने वहां अपना दूतावास खोला। भारत के इस कदम के करीब 30 साल बाद चीन ने 2011 में मालदीव में अपने राजनयिक केंद्र की स्थापना की, लेकिन जैसे ही चीन ने मालदीव से दोस्ती की, मालदीव और भारत के रिश्ते बिगड़ने लगे।
प्रो-इंडिया से प्रो-चाइना हुआ मालदीव- नवंबर-2013 में अब्दुल्ला यामीन मालदीव के नए राष्ट्रपति बने। यामीन का झुकाव चीन की तरफ था। उनकी सरकार में चीन की कूटनीति खूब फली। उनके ही शासनकाल में माले ने बीजिंग के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किया और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल हो गया। इस समझौते ने चीन को मालदीव के द्वीपों को पट्टे पर देने और देश में बीजिंग को आर्थिक और कूटनीतिक रूप से सक्रिय भूमिका निभाने की अनुमति दे दी। इस मौके का फायदा उठाते हुए चीन ने माले में बेतहाशा पैसे खर्च किए और मालदीव पर विकास के नाम पर भारी-भरकम कर्ज लाद दिया। आंकड़ों पर गौर करें तो अंगोला और जिबूती के बाद मालदीव चीन का तीसरा सबसे बड़ा कर्जदार है। इस छोटे से द्वीपीय देश पर चीन की इतनी राशि बकाया है, जो उसकी जीडीपी का लगभग 30 प्रतिशत के बराबर है। अधिकांश यामीन प्रशासन के दौरान का कर्ज है, जब चीन के इशारे पर यामीन सरकार नाच रही थी।
मालदीव में इमरजेंसी- अर्थशास्त्री कहे जाने वाले राष्ट्रपति यामीन के फैसलों से मालदीव में भारी विरोध होना शुरू हो गया। विपक्षी दलों ने वहां खूब हंगामा किया और चीन से प्रेरित नीति को खारिज करने की मांग की। जब यामीन सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो लोग सड़कों पर उतर आए। इससे बौखलाए अब्दुल्ला यामीन ने राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया। जब फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद नेताओं को रिहा करने का आदेश दिया तो फैसला सुनाने वाले जज को भी जेल में डाल दिया गया और देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई।

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20 इलाकों में 6 से 7 घंटे गुल रहेगी बिजली;कोहरे की वजह से ट्रेनें लेट होंगी

सुबह 10 से शाम 4 बजे तक भोपाल टाउन, जाटखेड़ी, गोल्डन वैली, इडन पार्क, हर्षवर्धन नगर, पंचशील नगर, एमएसीटी कॉलेज, विराशा हाइट्स, अवंतिका होम्स, जैन मंदिर, बंजारी सी सेक्टर, गिरधर परिसर, जेके टाउन एवं आसपास के इलाके।
कई ट्रेनें भी कैंसिल रहेंगी, ध्यान रखें- बिलासपुर-इंदौर, कमलापति-संत्रागाछी, बिलासपुर-भोपाल, शालीमार-भुज और दुर्ग-अजमेर एक्सप्रेस 16 जनवरी तक कैंसिल रहेगी।
यात्रा करने से पहले यात्रा रेलवे से पूछताछ करे-
कोहरे की वजह से कई ट्रेनें लेट होंगी। इसलिए जानकारी लेकर ही यात्रा करें।

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भारतीय शास्त्रीय संगीत का किला ध्वस्त हो गया

उस्ताद राशिद खान के जाने से भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक किला ध्वस्त हो गया। बहुत कम उम्र में गायन सीखना प्रारंभ किया और ऐसा रियाज किया कि आवाज को जिधर भी ले जाना चाहते… वहीं रास्ता बन जाता। शास्त्रीय संगीत में महज राग का स्वरूप, बंदिश के बोल, ताल… बस इतना ही याद करता है कलाकार बाकी, सब कुछ मंच पर ही क्रिएट करता है। खान साहब जैसा कलाकार अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत ही कम उम्र में इतने रास्ते दिखा गए हैं कि हम सभी उनके कृतज्ञ हैं। आमतौर पर लोग उन्हें ‘आओगे जब तुम साजना’ उस गीत से पहचानते हैं। बात ठीक भी है कि इस गीत से उन्हें बहुत लोकप्रियता भी मिली और वे इसे पसंद भी करते थे, पर ये उनके विशाल गायन रूपी झरने की एक मात्र एक बूंद है ।
उनका गायन परिपूर्ण था
तान, अलाप, खटका, मुर्की, गमक आदि सब कुछ उनके गायन में देखने मिलता है। जिस अन्दाज से ठुमरी गाते… ऐसा लगता जिसको भी वो मनाने की बात कह रहे हैं, उसे उनकी बात मानना ही पड़ेगी। जब वे भजन गाते ‘आज राधा ब्रज को चली’ तो राधा का पूरा प्रवास आंखों के सामने आ जाता। उन्होंने फ्यूजन, ठुमरी, भजन, फिल्मी गीत, वाद्यों के साथ जुगलबंदी, गजल के साथ शास्त्रीय गायन आदि सब कुछ किया।
वे पूर्णतया संगीत में डूबे हुए व्यक्ति 28 जनवरी 2020 को इंदौर म्यूजिÞक फेस्टिवल (संगीत गुरुकुल हर वर्ष पंडित जसराजजी के सम्मान में उनके जन्मदिन) में आयोजित करता है) में उनका गायन था। उस दौरान मैंने देखा और समझा कि सिर्फ अपने गायन से ही नहीं, एक बड़ा कलाकार अपने साथी, सहयोगियों और छोटे कलाकारों को आदर सम्मान देने जैसी खासियत से भी आमजन की नजर में बड़ा या महान होता जाता है। मुझ सहित इस आयोजन की व्यवस्था में जुड़े हर व्यक्ति-गुरुकुल के छात्रों के प्रति उनकी सहजता-सरलता से हम अभिभूत थे कि इतना बड़ा कलाकार और ऐसी विनम्रता।
कार्यक्रम के बाद मुझसे कहते गौतम सब ठीक हो गया ना? मैंने कहा- उस्ताद में क्या कहूं बस आपने हमारा निमंत्रण स्वीकार लिया… यही बहुत है… तो वे बोले- देखो तुम अपने गुरुजी (पंडित जसराज) के लिए इतना बड़ा आयोजन करते हो, यह बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उनके रहते ये कर रहे हो, जाने के बाद तो सभी करते हैं। फिर कहने लगे- हमारा गाना-बजाना तो कुछ भी नहीं है। हम जो सुनाते हैं, हमारे बुजुर्ग तो कलाकार तो बहुत पहले करके चले गए हैं, हम तो बस उनके बताये रास्ते पर चलने की कोशिश ही कर रहे हैं। हमारे गले से कभी कुछ अच्छा निकल जाता है तो गुरुओं को और भगवान को धन्यवाद देता हूं कि मुझसे सूई की नोक बराबर कुछ हो पाया।
कार्यक्रम के अगले दिन बसंत पंचमी थी। वे गुरुकुल आए, सरस्वती पूजन किया और विद्यार्थियों को राग वसंत सुनाया और बच्चों का गायन भी सुना और आशीर्वाद भी दिए और कहा- गौतम कितना अच्छा काम कर रहे हो, जब कभी मेरी जरूरत हो तो याद करना। राशिद खान साहब जीतने अच्छे कलाकार उतने ही उम्दा गुरु भी थे। उनके कई शिष्यों से मिला हूं, बातचीत भी होती रहती है। संगीत के साथ-साथ जो संस्कार हैं… अपने से बड़े और छोटों से प्यार-सम्मान करना है, उनके पुत्र और शिष्य दोनों में ही दिखाई देता है। सभी शिष्य अपने उस्ताद पर इतना प्यार रखते हैं और उस्ताद भी लगातार अपने शिष्यों को ज्ञान लुटाते रहते।
उस्ताद राशिद खान अवतार ही थे… जो काम भगवान ने उन्हें देकर भेजा, वो किया और चले गए। उनका जाना बहुत जल्दी हुआ। अभी एक-दो दशक और तबीयत से उनका गाना होता… पर प्रभु इच्छा।
उस्ताद राशिद खान से सीखने वाली बात ये है कि यदि आप अपनी जड़ों को (शास्त्रीय संगीत) मजबूत कर लें तो तो आप किसी भी प्रकार के संगीत को आसानी से गा सकते और सफल भी हो सकते हैं। संगीत में संकुचित मानसिकता से बाहर निकलकर ही असली संगीत से आपका परिचय हो सकता है ।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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पड़ताल: मप्र में 20 साल में आई 75% कमी; 2018 से 23 में हुई सिर्फ 92 बैठक

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यों की विधानसभा में बैठकों की घटती संख्या पर चिंता जताई है। भोपाल में विधायकों के प्रबोधन कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बैठकों की कम संख्या लोकतंत्र के लिए अच्छी परंपरा नहीं है।
लोकसभा अध्यक्ष की इस चिंता पर ने मध्यप्रदेश विधानसभा का रिकॉर्ड खंगाला तो पता चला कि 20 साल में बैठकों की संख्या 75% घट गई है। 11वीं विधानसभा में दिग्विजय शासनकाल (1998-2003) में पांच साल के दौरान 278 बैठकें हुई थीं। यह संख्या 15वीं विधानसभा (2018-2023) तक आते-आते घटकर 92 रह गई। इसमें कुछ सत्रों को छोड़ दें तो अधिकतर सत्र तय की गई अवधि से पहले ही खत्म हो गए।
ज्यादा दिन तक सत्र
चलाने में रुचि नहीं
जानकार कहते हैं कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी की भी रुचि अब ज्यादा दिन तक सत्र चलाने में नहीं रह गई है। सरकार का जोर इस बात पर रहता है कि विधायी कार्य पूरे हो जाएं। वहीं, विपक्ष शुरूआत से ही हंगामा करना शुरू कर देता है। अब हालत यह बनने लगी है कि प्रश्नकाल तक पूरा नहीं हो पाता और अध्यक्ष को सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ती है। सदन के सुचारू संचालन में पक्ष और विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जाहिर है कि दोनों पक्ष इसके लिए एक-दूसरे को ही जिम्मेदार बताते हैं।
अब जानिए, सत्र को लेकर कितनी गंभीरता
मध्यप्रदेश का बजट सत्र 7 से 19 फरवरी तक प्रस्तावित है। इस दौरान सिर्फ 8 बैठकें होंगी। सरकार सत्र में लेखानुदान पेश करेगी, जो करीब एक लाख करोड़ रुपए का होना संभावित है। जिस बजट के लिए प्रदेश में कभी 31 बैठकें होती थीं, वह अब सिमटते-सिमटते हफ्ते-दस दिन की बैठकों तक सीमित रह गया है। 11वीं विधानसभा में 25 से लेकर 31 बैठकों में बजट पारित हुआ, लेकिन 15वीं विधानसभा आते-आते 22 साल में बजट जैसे गंभीर मामले में बैठकों की संख्या 8 से 13 के बीच रह गई।
1999 में बजट सत्र
52 दिन का रहा
मध्यप्रदेश की 11वीं विधानसभा में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने फरवरी-मार्च 1999 में बजट पेश किया था। यह सत्र 52 दिन का था। यह अब तक की पांच विधानसभाओं का सबसे ज्यादा बैठकों का बजट सत्र रहा है। 31 बैठकों में बजट पर विधायकों ने चर्चा की, तब मध्यप्रदेश का बजट पारित हुआ

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