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350 करोड़ मेरे पारिवारिक राजनीतिक नहीं हैं

रांची, एजेंसी। इनकम टैक्स विभाग ने झारखंड से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद धीरज साहू के 10 ठिकानों पर छापेमारी की। ये छापेमारी 6 दिसंबर को शुरू हुई थी, जो 15 दिसंबर को खत्म हुई। 10 दिनों तक झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में की गई छापेमारी में 350 करोड़ रुपए से ज्यादा कैश बरामद हुआ है। इस छापेमारी के 10 दिन बाद धीरज साहू शुक्रवार को मीडिया के सामने आए और कहा कि ये सारा पैसा उनका नहीं है, बल्कि उनके परिवार और फर्म का है। वे हर चीज का हिसाब देंगे। धीरज ने यह भी कहा कि इस पैसे का कांग्रेस या किसी और पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। फिलहाल बरामद नोटों को बोलांगीर और संबलपुर स्थित स्टेट बैंक में जमा करा दिया गया है। पश्चिम ओडिशा में देशी शराब की लगभग 300 दुकानें साहू परिवार के नाम पर हैं।

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Bhajanlal Sharma new CM Rajasthan: राजस्थान के अगले सीएम होंगे भजनलाल शर्मा, विधायक दल की बैठक में एलान

राजस्थान के नए सीएम भजनलाल शर्मा होंगे। विधायक दल की बैठक में उनके नाम का एलान किया गया।

Rajasthan CM: राजस्थान को नया मुख्यमंत्री मिल गया है. भाजपा ने भजनलाल शर्मा को राज्य की कमान सौंपी है. छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की तरह भाजपा ने राजस्थान में भी सीएम पद के लिए अपने फैसले से सभी को चौंका दिया. यहां भी सियासी पंडितों के सारे अनुमान धरे के धरे रह गए.

राजस्थान में नए मुख्यमंत्री के लिए विधायक दल की बैठक शुरू हो चुकी है। अब से थोड़ी ही देर बाद कौन होगा राजस्थान का मुख्यमंत्री इसका खुलासा हो जाएगा। वहीं, नाम का एलान होने के बाद शाम 4.30 बजे राज्यपाल कलराज मिश्र से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे।

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बड़बोलापन रहा कांग्रेस की हार का कारण!

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम एग्जिट पोल के विपरीत भाजपा के पक्ष में गए है। तेलंगाना में सत्ता हासिल करने व छत्तीसगढ़ में संतोषजनक टक्कर देने के अलावा कांग्रेस राजस्थान व मध्यप्रदेश में बेअसर ही रही। चुनाव में जातीय जनगणना का मुद्दा जहां उसे ले डूबा वही राजस्थान में गहलोत-पायलट टकराव, मध्यप्रदेश में कमलनाथ व दिग्विजय का बड़बोलापन कांग्रेस की हार का कारण बना है। राजस्थान राज्य में 9 बड़े कारण कांग्रेस की हार के बने हैं।
पहला तो यही कि राजस्थान में रिवाज कायम रहा है जनता ने हमेशा सत्ता में बदलाव किया है। वहीं कांग्रेस की मुफ्त की रेवड़ी नहीं चली। कांग्रेस को गहलोत-पायलट विवाद महंगा पड़ गया। कन्हैयालाल हत्याकांड से चुनावी ध्रुवीाकरण हुआ है। कांग्रेस चुनाव के कुछ महीने पहले तक गुटबाजी से जूझती नजर आई। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की खींचतान का भी कार्यकर्ताओं पर प्रतिकूल असर पड़ा, जनता के बीच गलत संदेश गया है। भले ही चुनाव से ठीक पहले दोनों ही नेता हम साथ-साथ हैं का संदेश देते नजर आए हों लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कांग्रेस जहां गुटबाजी से जूझती रही, वहीं बीजेपी ने अंतर्कलह को कहीं बेहतर तरीके से हैंडल करती रही। बीजेपी ने गुटबाजी से पार पाने के लिए वसुंधरा राजे को न सिर्फ सीएम फेस घोषित करने से परहेज किया, बल्कि बड़े नेताओं को चुनाव मैदान में उतार दिया था। नतीजा ये हुआ कि नेताओं ने अपनी साख बचाने के लिए उस सीट पर जोर लगाया और इसका सकारात्मक असर आसपास की सीटों पर भी पड़ा। राजस्थान का चुनाव मोदी बनाम गहलोत हो जाना भी कांग्रेस को भारी पड़ा है।
पीएम मोदी के चेहरे ने कांग्रेस के जातिगत जनगणना के दांव की धार भी कुंद कर दी है। पीएम मोदी ने राजस्थान में ताबड़तोड़ चुनावी रैलियां कीं, वहीं कांग्रेस की ओर से प्रचार का भार सीएम गहलोत के कंधों पर अधिक नजर आया। चुनाव प्रचार के लिए राहुल गांधी मैदान में उतरे तो लेकिन वह भी महज खानापूर्ति ही रही। चुनाव पूरी तरह से मोदी बनाम गहलोत हो गया और इसका लाभ भी बीजेपी को मिला। अशोक गहलोत की सरकार ने चुनावी साल में एक के बाद एक चुनावी दांव चले, जिनमें चिरंजीवी योजना के तहत हेल्थ इंश्योरेंस की लिमिट बढ़ाकर 50 लाख रुपए करने का वादा किया गया, सस्ते गैस सिलेंडर समेत कई लुभावनी योजनाओं पर पेपर लीक, लाल डायरी और भ्रष्टाचार के आरोप भारी पड़े। कांग्रेस की हार के पीछे बागी भी बड़ी वजह माने जा रहे हैं। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद कई नेताओं ने पार्टी से बगावत कर बतौर निर्दलीय उम्मीदवार ताल ठोंक दी। कुछ बीजेपी और दूसरे दलों के टिकट पर भी मैदान में उतर गए।
इन बागियों ने भी कांग्रेस का नुकसान किया है। इसके ठीक उलट बीजेपी ने एक-एक बागी को मनाने के लिए बड़े नेताओं को जिम्मेदारी दी और उनको मनाने की पूरी कोशिश की। कई बागी मान भी गए और बीजेपी को इसका लाभ मिला है। वहीं मध्यप्रदेश की राजनीति में यह चुनाव परिणाम लंबे समय तक याद रखा जाएगा। इस परिणाम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर कांग्रेस जो जीत की जोरदार ताल ठोंक रही थी, उसे इतनी बुरी हार कैसे मिली? कारण चौंकाने वाले हैं, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ इन तीनों राज्यों में चुनाव के परिणाम पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष मे रहे हैं। प्रचंड जीत की ओर जाते हुए बीजेपी के प्रदेश कार्यालयों में ढोल ढमाके बज रहे हैं, लड्डू बंट रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के खेमे में मायूसी है। जो लड्डू कांग्रेस कार्यालय में आए थे, वे वैसे ही रखे हुए हैं। सवाल यह है कि जो कांग्रेस 2019 में बहुमत के आंकड़े तक पहुंच गई थी, वो ऐसा क्या हुआ कि 2023 के चुनाव परिणाम के रुझानों में अब तक बुरी तरह हार की कगार पर है। जिसका कारण एंटी इंकंबेंसी का कोई रोल नहीं रहा। बीजेपी एंटी इंकंबेंसी को नकारकर जीती है। राजनीति में यह शोध का विषय होना चाहिए। क्योंकि 18 साल बाद भी एक चुनाव होता है और किसी पार्टी को प्रचंड जीत मिलती है, वो भी 18 साल तक शासन में रहने के बाद। जबकि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी सत्ता से चली गई पर 15 महीनों को छोड़कर एमपी में नहीं। दिग्गी कमलनाथ ने किसी को नहीं बढ़ने दिया।
कांग्रेस ने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से बड़ा नेता किसी को नहीं बनने दिया। दोनों नेता वयोवृद्ध हैं। कमलनाथ की उम्र 77 साल और दिग्विजय सिंह की उम्र 76 साल है। यूथ लीडर्स का कोई बैकअप नहीं ,किसी यूथ लीडर को आने नहीं दिया। ​ज्योतिरादित्य सिंधिया जो कांग्रेस में एक बड़ा कद थे। युवा थे, उन्हें भी दरकिनार कर दिया गया था। मजबूरन उन्हें बीजेपी का दामन थामना पड़ा। मध्यप्रदेश कांग्रेस में युवा नेतृत्व का बैकअप में नहीं बन पाया। केवल विक्रांत भूरिया यूथ कांग्रेस अध्यक्ष हंै, जो कां​तिलाल भूरिया के बेटे हैं और पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर हैं। उन पर भी वरिष्ठ कांग्रेसी और पूर्व मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की छाप है। कमलनाथ का अड़ियल रवैया, सबसे अहम बिंदु राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह है कि कमलनाथ में राजनीतिक नेतृत्व करने की क्षमता नहीं है, वो राजनेता कम और बड़ी कंपनी मैनेजर ज्यादा लगते हैं। वो राजनीतिक बैठकों में कॉर्पोरेट मीटिंग जैसा व्यवहार करते रहे हैं। कमलनाथ मिनटों के हिसाब से विधायकों को मिलने का समय देते थे। वो कहते थे चलो चलो , उन्हें जनता ने चलता कर दिया।
कमलनाथ की छवि पर भारी शिवराज की छवि : कांग्रेस में जहां कमलनाथ का रवैया तानाशाही रहा है, वहीं दूसरी ओर बीजेपी इसलिए आगे निकली कि एमपी के सीएम शिवराज जमीनी नेता हैं, वे लोगों और विधायकों की सुनते भी हैं, बोलते भी हैं। शिवराज की सरल छवि कमलनाथ की छवि पर भारी पड़ी है। कांग्रेस को अब सोचना होगा कि घिसे पिटे नेताओं पर भरोसा करने के बजाए नए बेदाग छवि के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को आगे लाए, तभी कांग्रेस में कुछ जान आ सकती है।
(लेखक राजीनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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आर्टिकल 370 अस्थायी था, सितंबर 2024 तक चुनाव कराने का आदेश

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का केंद्र सरकार का फैसला बरकरार रहेगा। सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने सोमवार को कहा- आर्टिकल 370 अस्थायी प्रावधान था। संविधान के अनुच्छेद 1 और 370 से स्पष्ट है कि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। भारतीय संविधान के सभी प्रावधान वहां लागू हो सकते हैं। केंद्र ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से 370 हटा दिया था। इसके 4 साल, 4 महीने और 6 दिन बाद आए फैसले में कोर्ट ने कहा, ‘हम आर्टिकल 370 को निरस्त करने के लिए जारी राष्ट्रपति के आदेश को वैध मानते हैं। हम लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले की वैधता को भी बरकरार रखते हैं।’ इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में 30 सितंबर 2024 तक विधानसभा चुनाव कराने के आदेश दिए। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में 5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 खत्म कर दिया था। साथ ही राज्य को 2 हिस्सों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कुल 23 याचिकाएं दाखिल हुई थीं। 5 जजों की बेंच ने सभी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई की थी। संविधान पीठ में चीफ जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस कौल और जस्टिस खन्ना शामिल थे। बेंच के सामने लगातार 16 दिन तक चली सुनवाई 5 सितंबर को खत्म हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। यानी सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के 96 दिन बाद केस पर फैसला सुनाया।
चीफ जस्टिस बोले- केंद्र के हर फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दे सकते
सीजेआई ने कहा केंद्र की तरफ से लिए गए हर फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। अगर केंद्र के फैसले से किसी तरह की मुश्किल खड़ी हो रही हो, तभी इसे चुनौती दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की यह दलील खारिज कर दी कि राष्ट्रपति शासन के दौरान केंद्र ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकता, जिसमें बदलाव न किया जा सके।

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मनोहर लाल खट्टर पहुँचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिलने…………

पर्यवेक्षकों के दल को हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर लीड कर रहे हैं. उनके साथ पार्टी के ओबीसी मोर्चा के प्रमुख के लक्ष्मण और सचिव आशा लाकड़ा भी है. वहीं, मध्य प्रदेश के लिए रवाना होने से पहले मनोहर लाल खट्टर ने खुलासा किया कि, एमपी में सीएम का चुनाव किस तरह से किया जाएगा………

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्‌टर दिल्ली से भापाल के लिए रवाना हो गए। वह मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर मंथन करेंगे। केंद्रीय नेतृत्व की ओर से उन्हें बतौर पर्यवेक्षक इसकी जिम्मेदारी दी गई है। उनके साथ भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पदाधिकारी डॉक्टर के लक्ष्मण, आशा लाकड़ा भी पर्यवेक्षक रवाना हुए हैं। भोपाल में होने वाली इस अहम मीटिंग में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्‌डा भी मौजूद रहेंगे।

4 बजे शुरू होगी मीटिंग

भोपाल में होने वाली विधायक दल की मीटिंग से पहले दोपहर एक बजे लंच में भी सीएम मनोहर लाल शामिल होंगे। लंच के बाद 4 बजे मीटिंग शुरू होगी और 6 बजे तक मुख्यमंत्री का नाम फाइनल होने की संभावना है। हरियाणा के मुख्यमंत्री को इस बड़ी जिम्मेदारी को कई मायनों में देखा जा रहा है। पहला तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफी करीबी है। वह अक्सर कहते भी रहते हैं प्रधानमंत्री उनके अच्छे मित्र हैं। उन्होंने पीएम के साथ हरियाणा में संघ में शामिल रहने के दौरान अच्छा वक्त साथ बिताया है।

हरियाणा CM की साफ छवि पर जताया विश्वास

केंद्रीय नेतृत्व में लगातार उनकी साफ स्वच्छ छवि को लेकर धाक जमती जा रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्हें 10 होने जा रहे हैं, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान कोई भी बड़ा आरोप उन पर नहीं लगा है। जबकि उन्होंने सूबे में सरकारी विभागों से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कई बड़े फैसले भी लिए हैं।

पार्टी को हर चुनाव में मिला फायदा

हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल के कार्यकाल के दौरान भारतीय जनता पार्टी को हर चुनाव में बढ़त मिली है। 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान सूबे की 10 सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों को जीत मिली है। इसके अलावा नगर निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव में भी पार्टी को बढ़त मिली है। सरकार के साथ ही सीएम मनोहर लाल संगठन को भी साथ लेकर चलते हैं।

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