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भू-माफिया जैन, अरुण डागरिया और अतुल सुराना पर केस दर्ज

प्लॉट के नाम पर धोखाधड़ी के मामले में लसूडिया पुलिस ने कुख्यात भू-माफिया अरुण डागरिया, अतुल सुराना और महेंद्र जैन के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया है। एफआईआर 90 एकड़ में फैली प्रिंसेस एस्टेट को लेकर हुई। इस कॉलोनी के प्लॉटधारकों की शिकायत पर पहले भी तीनों के खिलाफ केस दर्ज हो चुके हैं। डीसीपी (जोन-2) अभिनव विश्वकर्मा ने बताया कि एमआर -11 पर प्रिंसेस स्टेट कॉलोनी है। जहां आम लोगों को कॉलोनी के प्लाट बेच कर उनसे प्लॉट की धनराशि प्राप्त की गयी थी लेकिन प्लॉटधारकों को प्लॉट का पेजेशन नहीं दिया गया। शिकायतकर्ताओं की शिकायत की जांच एसीपी (विजयनगर) कृष्ण लालचंदानी के निर्देशन में हुई। पता चला फैनी कंस्ट्रक्शन और वीटेक मार्कोन प्रायवेट लिमिटेड नाम से कंपनी बना कर एमआर-11 पर प्रिंसेस स्टेट कॉलोनी काटी गई। फैनी कंस्ट्रक्शन के डायरेक्टर अरुण डागरिया और महेन्द्र जैन के साथ वीटेक मार्कोन प्रायवेट लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टर अतुल सुराना ने 24 से अधिक व्यक्तियों से पैसा लेकर अविकसित कॉलोनी के प्लॉट बेचे। 1998 से आज तक उनको कब्जा नहीं दिया। आरोपियों ने भूमि पर प्लॉट दिखाकर बेचे। 24 आवेदनों की जांच के बाद लसूडिया में धोखाधड़ी की धाराओंके तहत केस (443/2024) दर्ज किया गया।

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कमलनाथ के बंगले पर पुलिस का छापा, पीए और एक अन्य पर केस

छिंदवाड़ा। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के छिंदवाड़ा वाले बंगले पर सोमवार को पुलिस ने छापेमार कार्रवाई की। भाजपा प्रत्याशी की शिकायत पर कमनलाथ के पीए आरके मिगलानी और एक अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गइ्र है। आरोप है कि दोनों ने आपत्तिजनक वीडियो वायरल की। इसी शिकायत पर कार्रवाइ्र हुई है। इससे पहले पांढुर्णा विधायक के घर भी साहु की शिकायत पर पुलिस ने छापेमार कार्रवाई की थी। शिकारपुर में कमलनाथ का बंगला है। पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले पर ऐसे अचानक पुलिस टीम के पहुंचने से सनसनी मच गई है। दरअसल यहां से बीजेपी प्रत्याशी बंटी साहू ने आरोप लगाया है कि कमलनाथ के पीए आरके मिगलानी ने उनका आपत्तिजनक वीडियो वायरल किया था। इसकी शिकायत बंटी साहू ने पुलिस से भी की थी। इसी मामले में पुलिस मिगलानी से पूछताछ के लिए कमलनाथ के बंगले पर गई है। मामले में एक पत्रकार का नाम भी आया है।

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दे…दना…दन….आईपीएल 24- रिकॉर्ड तोड़ बल्लेबाजी

2024 अब तक का आईपीएल का सबसे ऐतिहासिक सीजन साबित हो रहा है। सोमवार को सनराइजर्स हैदराबाद और रॉयल चैलेंजर बेंगलुरु के बीच मुकाबला था। दोनों पारियों के 40 ओवर में कुल 10 विकेट पर 549 रन बने हैं। मतलब हर 13.72 रन/ओवर। इसी औसत से रन बने तो ओ दिन दूर नहीं जब 50 ओवर के वन-डे में 680 से ज्यादा रन बनेंगे। हर दूसरी-तीसरी गैंद पर चौके-छक्के देखना दर्शकों भी रास आ रहा है। खिलाड़ियों की ताबड़तोड़ पारियों ने फटाफट क्रिकेट को गति दे दी है।
पहले बेटिंग करते हुए हैदराबाद ने 120 गेंदों में 287 रन बनाए। 240 के स्ट्राइक रेट से। जवाब में 218.33 की औसत से बेंगलुरु ने 262 रन बनाए। खास बात यह है कि कुल 81 बाउंड्री लगी। जिनसे कुल 400 रन बने। इनमें 38 छक्कों से 228 रन बने जबकि 43 चौकों से 172 रन। 0 पर बेंगुलुरू के सौरव चौहान ही आउट हुए।
हैदराबाद : पांच खिलाड़ियों ने कुल 24 डोट बॉल खेली जबकि 22 छक्के लगाए। सबसे कम स्ट्राइक रेट 154.54 अभिषेक शर्मा का रहा। जिन्होंने 22 गेंद में 34 रन बनाए। सबसे ज्यादा स्ट्राइक रेट अब्दुल समद का रहा। समद ने 370 की औसत से 10 गेंद पर 37 रन बनाए। तीन छक्के-चार चौके लगाए। एक्सट्रा 15 रन।
बेंगलुरु : नौ खिलाड़ियों ने कुल 30 डोट बॉल खेली। सबसे कम 50 का औसत विजय व्यस्क का रहा। जिन्होंने 2 गेंद पर एक रन बनाया। सबसे ज्यादा 237.14 का औसत दिनेश कार्तिक का रहा। जिन्होंने पांच चौके और सात छक्कों से 35 गेंद पर 83 रन बनाए।

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‘हिंदुत्व’ से हड़बड़ाहट में विपक्ष मुस्लिम प्रत्याशियों से उठा भरोसा

सपा, बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों के लिए मुस्लिम वर्ग बड़ा मतदाता रहा है। हालांकि हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा को मिल रही सफलता ने इन पार्टियों का मुस्लिमों के प्रति मोह भंग किया है। इसका अंदाजा 2014 से 2024 के मुकाबले घटी इन दलों के मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या से लगाया जा सकता है। हालत यह है कि 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में भी इन दलों ने मुस्लिम प्रत्याशियों को नकार दिया। शायद अब यह दल मान चुके हैं कि मुस्लिम को टिकट देने से हिंदु वोट कम मिलते हैं। वहीं हिंदु को टिकट दिया तो परम्परागत मुस्लिम वोट तो मिलना ही हंै, हिंदु वोट भी मिलेंगे।
हमारे इस एनालिसिस का मकसद हिंदू-मुस्लिम को अलग करके देखना नहीं है। ये सिर्फ विश्लेषण है जो बताता कैसे सियासी दल अपने फायदे के लिए हिंदुओं और मुसलमानों का इस्तेमाल करते हैं। एआईएमआईएम यानि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी दावा करती है कि वो मुस्लिमों की आवाज है। कांग्रेस कहती है कि वो हिंदुओं और मुसलमान दोनों की आवाज उठाते हैं। आरजेडी बिहार में मुस्लिम-यादव(एमवाय)फैक्टर को आजमाती है।
भारत की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं के वोटों को निर्णायक माना जाता है। धार्मिक आबादी के हिसाब से देश में मुस्लिम दूसरे नंबर पर आते हैं। इन वोटों की क्या अहमियत होती है इसे देश का हर सियासी दल समझता भी है। कोई हंसाकर तो कोई डराकर मुस्लिमों के वोट लेना चाहता है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजपार्टी, टीएमसी, आरजेडी जैसे तमाम सियासी दलों को उम्मीद है कि मुस्लिम उनकी नाव को पार लगा सकते हैं, लेकिन जब इन पार्टियों का मुस्लिमों को टिकट देने का नंबर आता है तो सब शून्य हो जाते है। हिंदुत्व की लहर को देखते हुए 2024 के आम चुनाव में इंडी गठबंधन के दल भी मुस्लिमों का खुला समर्थन करने से बच रहे हैं। इसीलिए 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले जिस मुरादाबाद ने अब तक 11 बार मुस्लिम नेताओं को चुनकर संसद भेजा, वहां से इस बार सपा ने सांसद डा. एसटी हसन का टिकट काटकर रुचि वीरा को गठबंधन प्रत्याशी बनाया। मुस्लिम आबादी वाले बिजनौर से कोई मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में नहीं है। यही हाल मुजफ्फरनगर, मेरठ और बागपत सहित कई उन सीटों का भी है।
मुजफ्फरनगर से भाजपा के संजीव बालियान मैदान में हैं तो करीब पांच लाख मुस्लिम आबादी के बावजूद सपा ने हरेंद्र मलिक और बसपा ने दारा सिंह प्रजापति को टिकट दे दिया। चार से पांच लाख मुस्लिम मतदाताओं वाली बिजनौर सीट से रालोद ने चंदन चौहान को गठबंधन प्रत्याशी बनाया सपा ने दीपक सैनी और बसपा ने चौ. वीरेंद्र सिंह को उतार दिया।
टिकट न देंगे तो भी वोट देंगे ही मुस्लिम- सियासी समीक्षक कहते हैं सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दल अब इस आशंका से डरने लगे हैं कि मुस्लिमों को ज्यादा टिकट देने से भाजपा इसे मुस्लिम तुष्टिकरण के रूप में प्रचारित कर ध्रुवीकरण न करा दे। इस पर मुस्लिम मतदाताओं के रुख के प्रश्न पर वह कहते हैं कि यह तीनों ही दल जान चुके हैं कि प्रतिनिधित्व न भी दिया जाए तो उनके लिए वोट बैंक बन चुका मुस्लिम जाएगा कहां?

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मोदी की गारंटी में भी तड़प रही ‘विकास की मछली’!

2024 के लोकसभा चुनाव की शहनाई वैसे तो बज चुकी है, अब तो पहले चरण का चुनाव भी होने वाला है। तकरीबन हर राजनीतिक पार्टी ने अपने बचे-खुचे सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय करने के साथ ही आधिकारिक ऐलान भी कर दिया है। यूपी की बात करें तो पूर्वांचल की एक ऐसी सीट रही जिसको लेकर हर कोई ऊधेड़बुन में रहा कि आखिर में भाजपा के बाद अब सपा-कांग्रेस गठजोड़ किस उम्मीदवार को टिकट देगा। अंत में मछलीशहर लोस सीट पर सपा ने अपनी ही पार्टी के पूर्व सांसद रहे और मौजूदा समय में इसी सीट के विधानसभा क्षेत्र से सपा विधायक तूफानी सरोज की बेटी प्रिया सरोज की उम्मीदवारी पर अपनी राजनीतिक मुहर लगाई। जबकि बीजेपी ने लगातार दूसरी बार इस सीट से वर्तमान सांसद बीपी सरोज को चुनावी मैदान में उतारा और वहीं बसपा ने पंजाब कॉडर के पूर्व आईएएस रहे कृपाशंकर सरोज को हाथी चुनाव चिन्ह सौंपकर अपनी दावेदारी पेश की।
2014 से लेकर अब तक बीजेपी का ही इस सीट पर कब्जा रहा हैं। इस क्षेत्र के कुछ वरिष्ठजनों की मानें तो पीएम मोदी के वाराणसी संसदीय सीट से सटे होने के बावजूद मछलीशहर क्षेत्र में विकास की मछली आज भी तड़पती हुई नजर आ रही। जौनपुर और वाराणसी क्षेत्रों को मिलाकर मछलीशहर सुरक्षित संसदीय सीट को बनाया गया है। जातीय आंकड़ों पर गौर करें तो यहां पर सबसे अधिक पासी यानी सरोज, सोनकर, धोबी, निषाद और उसके बाद यादव, मुस्लिम, ठाकुर, बनिया, वर्मा आदि अन्य जातियां शामिल हैं। मौजूदा राजनीतिक परिवेश में देखें तो बीजेपी, सपा और बसपा ने इस बार के चुनाव में एक ही वर्ग यानी सरोज-पासी समुदाय से जुड़े उम्मीदवार को उतारा है तो मुकाबला त्रिकोणीय होना लाजिमी है। यहां के स्थानीय जानकारों की मानें तो चूंकि मछलीशहर सीट को यहां पर न तो जौनपुर शहरी सीट और न ही वाराणसी सीट से किसी प्रकार का पॉलिटिकल बैकअप, नहीं मिल पाता तो सदन में इनके चुने गये जनप्रतिनिधियों की जनसमस्या को लेकर सुनवाई भी समय पर नहीं हो पाती है। यहां पर न तो अब तक किसी प्रकार का औद्योगिक विकास हो पाया और न ही कोई अन्य सतत विकास दिखा।
इस क्षेत्र के अधिकांश लोग खेती-बाड़ी पर निर्भर हैं। परंपरागत कल-कारोबार से जुड़कर जैसे-तैसे करके अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं। यहां के ज्यादातर युवा काम की तलाश में महाराष्ट्र-मुंबई-पुणे, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गाजियाबाद या कोलकाता जैसे शहरों की ओर पलायन को मजबूर रहते हैं।
हालांकि यहां पर शिक्षा का उन्नति तो दिखती है, मगर वो भी इस रूप में की कि यहां पर कुछेक शिक्षण संस्थानों को छोड़ दिया जाये तो अधिकांश प्रतियोगी और एकेडमिक छात्र-छात्रायें यूनिवर्सिटी की ओर उच्च और शोधपरक पठन-पाठन के लिये निकल जाते हैं…और यदि सफल हो गये तो फिर इक्का-दुक्का ही यहां पर लौटकर आते हैं। ऐसे में मछलीशहर संसदीय क्षेत्र में शैक्षिक बे्रन ड्रेन भी प्रचलन कहीं देखने को मिलता है। रेलवे, और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी शहर संसदीय सीट को लेकर पूर्व और वर्तमान में कई घोषणायें होती आई हैं। मौजूदा हाल में जमीनी हकीकत इससे कहीं जुदा है।

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