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इंदौर

इंदौर में 40 किलो चॉकलेट से बना दिया

इंदौर में एक शेफ ने राम मंदिर की प्रतिकृति का चॉकलेट केक तैयार किया है। केक में 40 किलो चॉकलेट यूज हुई है और इसे बनाने में 4 दिन का टाइम लगा। केक डिस्प्ले के लिए है और 15 से 20 डिग्री टेम्प्रेचर पर 1 साल तक रख सकते हैं। केक पर एडिबल गोल्ड की पॉलिश की गई है, जिससे इसकी खूबसूरती और भी बढ़ गई है। जानिए केक तैयार करने की पूरी कहानी…
इंदौर की नामी होटल शेरेटन ग्रैंड पैलेस के शेफ अमित मिश्रा ने यह केक बनाया है। अमित ने बताया कि 10-11 जनवरी को जनरल मैनेजर रोहित वाजपेयी और करण डोबरा से इस बारे में बात की थी। उन्होंने कहा था- राम मंदिर की प्रतिकृति का केक बेहतरीन बने, ताकि इसे डिस्प्ले कर सकें। चॉकलेट से केक बनाना काफी चैलेंजिंग था। इसके बाद सबसे पहले 8 लोगों की टीम ने इस पर वर्क करना शुरू किया। राम मंदिर की डिजाइन के प्रिंट आउट निकाले। फिर पेपर पर हमने डिजाइन बनाई। इसके बाद चॉकलेट से केक बनाना शुरू किया। शुरुआत में हम शेप नहीं दे पा रहे थे। रोज 6 घंटे टीम के साथ इस पर वर्किंग करते थे। 4 दिन केक को बनाने में लगे।
40 किलो से ज्यादा ही चॉकलेट इसमें लगी है। नीचे का बेस 10 किलो का है। उसके ऊपर सारे पिलर 7 से 8 किलो के हैं। मार्केट में राम मंदिर का लकड़ी का जो स्ट्रक्चर है। उसमें टॉप पर चार लेयर हैं। फिर तीन दो और फिर एक लेयर है। उसी तरह से हमने केक को बनाया है। केक बनाने में ज्यादातर तो चॉकलेट का ही यूज किया है। गोल्डन कलर (एडिबल गोल्ड, जिसे वैजिटेबल आॅयल के साथ ब्रश) से पेंट किया है। इसमें किसी भी प्रकार की मशीन का इस्तेमाल नहीं हुआ है। मंदिर के अंदर तीनों फ्लोर पर घंटियां भी लगाई हैं। इसके लिए छत में फूलों की तरह जो शेप दिया जाता है, वो भी दिया है। मंदिर में चार गेट भी बनाए हैं, जैसा राम मंदिर में हैं।
15 से 20 डिग्री टैम्परेचर पर इसे लंबे समय तक रख सकते हैं। चॉकलेट कलर चेंज होता है, लेकिन एक साल तक यह खराब नहीं होगा। चॉकलेट खा सकते हैं, लेकिन इस केक को खा नहीं सकते। इसे सिर्फ डेकोरेशन के लिए ही बनाया है। सभी की आस्था भी जुड़ी हुई है, इसलिए डिस्प्ले के तौर पर ही हम इसे दिखाना चाहते हैं। इसके साइज की बात करें तो चौड़ाई 2 फीट होगी और लंबाई तीन फीट होगी।

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943 करोड़ रुपए में तैयार हुआ………

देश के चार धामों में से एक 12वीं सदी में बने ओडिशा के पुरी जगन्नाथ मंदिर हेरिटेज कॉरिडोर का काम पूरा हो चुका है। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक इस कॉरिडोर का आज को उद्घाटन करेंगे।
ओडिशा सरकार ने उद्घाटन कार्यक्रम में भारत और नेपाल के एक हजार मंदिरों को न्योता भेजा है, साथ ही देश के चारों शंकराचार्यों, चारों पवित्र धाम और चार अन्य छोटे धामों को भी आमंत्रित किया है। मंदिर प्रशासन ने नेपाल के राजा को भी निमंत्रण भेजा है। प्रोजेक्ट के तहत मंदिर से लगे बाहरी दीवार (मेघनाद पचेरी) के चारों तरफ 75 मीटर चौड़ा गलियारा बनाया गया है। मंदिर के चारों ओर 2 किलोमीटर में श्रीमंदिर परिक्रमा पथ का निर्माण किया गया है। यहां से श्रद्धालु मंदिर का सीधे दर्शन कर सकेंगे। दिसंबर-2019 में शुरू हुए प्रोजेक्ट के तहत बने रिसेप्शन सेंटर में 6 हजार भक्त एक साथ खड़े हो सकेंगे। यहां 4 हजार परिवारों के लिए सामान रखने के लिए लॉकर रूम, शेल्टर पवेलियन, मल्टीलेवल कार पार्किंग, पुलिस और फायर ब्रिगेड और इमरजेंसी के लिए शटल बस की सुविधा दी गई है। आज पूर्णाहुति के साथ इसे विधिवत् रूप से श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाएगा। 943 करोड़ रुपए में बनाए गए इस प्रोजेक्ट का मकसद 12वीं सदी के जगन्नाथ मंदिर को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल करना है।

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तेंदुए दिखा : सॉफ्टवेयर कंपनियों के हजारों कर्मचारियों में दहशत

इंदौर के सुपर कॉरिडोर पर तेंदुए के मूवमेंट से सॉफ्टवेयर कंपनियों में दहशत का माहौल बन गया है। मामले में दो इंटरनेशनल सॉफ्टवेयर कंपनियों ने कर्मचारियों के लिए एडवाइजरी जारी करते हुए कर्मचारियों के समय में बदलाव किया है। मंगलवार को जानकारी के बाद फॉरेस्ट की टीम और अफसर भी मौके पर पहुंचे। तेंदुए के पग मार्क भी मिले हैं। दोनों कंपनियों ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है। सुपर कॉरिडोर इलाके में स्थित टीसीएस और इंफोसिस कंपनी ने मंगलवार को सभी कर्मचारियों को एक एडवाइजरी नोट मेल किया है। इसमें टू-व्हीलर वाहनों से आने वालों को अलर्ट रहने की बात कही गई है। उन्हें शाम को आॅफिस से समय से पहले निकलने और नाइट शिफ्ट में आने वालों को तय समय से थोड़ा जल्दी आने के लिए कहा गया है। कर्मचारियों से अंधेरा होने पर सुनसान इलाके में पड़ने वाले सर्विस लेन का उपयोग नहीं करने और कैंपस के बाहर घूमने से मना किया गया है। दोनों ही कंपनियों ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने की जानकारी भी दी है। फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की टीम मंगलवार को डीएफओ महेंद्रसिंह सोलंकी के आदेश पर सुपर कॉरिडोर इलाके में चैकिंग करने पहुंची। उन्हें यहां तेंदुए के पग मार्क दिखे। टीम ने फोटो लेने के बाद अफसरों को जानकारी दी। इसके बाद वह कंपनी के कैंपस में पहुंचे और यहां भी चैकिंग की। हालांकि तेंदुए के बारे में फिलहाल कोई जानकारी नहीं मिली है।

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अब ट्रैफिक और नशामुक्ती में भी बनाएंगे इंदौर होगा नंबर वन : विजयवर्गीय

इंदौर स्थित केंद्रीय सरकारी कर्मचारी कल्याण समिति द्वारा ट्रैफिक नियमों और नशाखोरी के दुष्परिणामों पर केंद्रित जागरूकता मिनी मैराथन का आयोजन किया गया। यह मैराथन रविवार की प्रात: 7:30 बजे नेहरू स्टेडियम से आरंभ होकर शिवाजी प्रतिमा, गीता भवन चौराहा, पलासिया चौराहा, गिटार चौराहा होते हुए इसी मार्ग से वापस लौटी।
कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा मैराथन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। इस अवसर पर मंत्री विजयवर्गीय ने कहा कि स्वच्छता के मामले में इंदौर देश में सातवीं नंबर वन रहा है और अब हम सभी के प्रयासों से यातायात व्यवस्था के साथ ही नशाखोरी मुक्ति में भी इंदौर नंबर वन की कतार में है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय सरकार की सरकारी कर्मचारी कल्याण समन्वय समिति का यह प्रयास सराहनीय है। मैराथन के जरिए ट्रैफिक नियमों के पालन करने के साथ ही नशाखोरी के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया है।
इस अवसर पर ट्रैफिक नियमों के पालन तथा नशाखोरीमुक्ति पर शपथ भी दिलवाई गई। कार्यक्रम के दौरान मैराथन में सहयोगी रहे ओमेक्स, अग्रवाल ग्रुप, इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक के साथ ही केंद्रीय सरकार के पर्यटन विभाग को मंत्री विजयवर्गीय ने स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। मैराथन कार्यक्रम के दौरान केन्द्रीय संचार ब्यूरो की पब्लिसिटी वैन के जरिए ट्रैफिक नियमों के साथ ही नशाखोरी मुक्ति पर केंद्रित वीडियो और आॅडियो प्रसारित किए। इससे पूर्व समिति के अध्यक्ष विजयपाल राव न्यायिक सदस्य आयकर अपीलीय अधिकरण ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि इस बार समिति ने ट्रैफिक नियमों के पालन तथा नशाखोरी मुक्ति की दिशा में जागरूकता के लिए मैराथन आयोजित की है। आगे भी समिति नए-नए विषयों को लेकर कार्य करेगी। समिति सचिव सुनील साहू, उपायुक्त सीजीएसटी ने समिति के कार्य विषयों के साथ ही मैराथन के बारे में विस्तार से बताया।
इस अवसर पर समिति अध्यक्ष विजयपाल राव, उपाध्यक्ष बीएम बियाणी लेखा सदस्य आयकर अपीलीय अधिकरण, प्रीति अग्रवाल पोस्ट मास्टर जनरल इंदौर परिक्षेत्र, अतिरिक्त आयुक्त ट्रैफिक पुलिस मनीष अग्रवाल, प्रधान आयकर आयुक्त अजय अत्री सहित समिति के संयुक्त सचिव एवं एग्जीक्यूटिव सदस्य तथा केंद्र सरकार के कार्यालयों के प्रमुख और अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे। इस अवसर पर सभी मैराथन धावकों को समिति ने मेडल से सम्मानित किया। मैराथन में तकरीबन 700 लोगों की सहभागिता रही। मुख्यत: जिसमें बीएसएफ, पुलिस के जवान शामिल थे। समिति के उपाध्यक्ष एवं आयकर अपीलीय अधिकरण के लेखा सदस्य बीएम बियानी ने आभार व्यक्त किया।

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पतंगबाज की यादेंहवा में बनाए रखना ही अच्छी पतंगबाजी

पतंग का नाम सुनते ही ना जाने कितनी खट्टी-मीठी यादें मन में दौड़ जाती हैं। 80 के दशक में अलग-अलग प्रकार की पतंगों से बाजार पटे रहते थे। सिरकटी, तिरंगी, चौकड़ी, परियल, डंडियल, कानभात, आंखभात, चांदभात, गिलासिया, चुग्गी, ढग्गा… और भी ना जाने कितने अनूठे प्रकार की पतंगे होती थीं।
पतंग बनाना और उनको उड़ाना एक विशिष्ट कला होती थी। किसी गली में डोर ‘सूती’ जा रही है। कोई फ्यूज बल्बों को फोड़कर कांच पीस रहा है। कोई ‘सरस’ या नीला थोथा रंग के साथ घोल रहा है। घोल तैयार होते ही किसी के हाथों में धागे की ‘रील’ होती है… और कोई उसे घोल में डुबोकर ‘चकरी’ में लपेट रहा है। इस चकरी को ‘हुचका’ या ‘उचका’ भी कहते हैं। बिजली के दो खंभों के बीच यह डोर सुखाई जाती है और फिर लपेट ली जाती है। यह संक्रांति की पूर्व संध्या की बात होती थी… खैर! अब तो डोर और पतंग बाजार से ले आते हैं।
उस्ताद लोग हम बच्चों को पतंग उड़ाने की कला स्टेप बॉय स्टेप सिखाते थे। सबसे पहले जोते बांधना सिखाया जाता था। यह एक युक्तिसंगत वैज्ञानिक प्रक्रिया है। सबसे पहले तो अपनी पतंग को मांझे से बांधें। इसके लिए मांझे का लगभग 1 मीटर लम्बाई का धागा तोड़ लें और उसे दोहरा कर लें। अब आप पतंग के बीच में धनुषाकार किमची और लम्बवत किमची के मिलने वाले जगह में एक छेद लेफ्ट साइड में ऊपर की तरफ करें और दूसरा चीड़ राइट साइड में नीचे की तरफ करें (ऊपर-नीचे तिरछे छेद) और मांझे के एक सिरे को बांधें… इसी तरह आप पतंग के नीचे वाले हिस्से में छेद करें और मांझे को बांधे। अब आप मांझे को बीच में से पकड़ें और उसे दोनों तरफ समान लम्बाई में नापें और मांझे के ठीक बीच में ऊपरी हिस्से में एक लगभग 1 इंच का लूप रखते हुए गांठ लगा दें। पतंग को लूप से पकड़कर जमीन से ऊपर उठाकर हवा में लहराकर उसका बैलेंस देख लें। यदि दोनों तरफ समान है… पतंग के जोते तैयार हैं।
यदि पतंग एक तरफ झुक रही है तो दूसरीं तरफ मोटे धागे या सुतली का टुकड़ा बांधकर उसको बैलेंस किया जाता था… इस कला को खिरनी बांधना कहते हैं।
अब उस लूप में मांझे को कसकर गठान लगाकर बांधें और अपने हाथ में मांझे को पकड़ें और अपने साथी को बोलें कि वो पतंग को आपसे दूर ले जाकर जाए और पतंग को दोनों कोनों से पकड़कर हवा की दिशा (हवा का प्रवाह आपके पीछे से आपकी साथी के चेहरे की तरफ हो) में खड़ा हो। धागे को तानें और साथी को पतंग को हवा में ऊपर धकेलने / उछालने के लिए बोलें, ताकि आपकी पतंग हवा में आ सके। इस बात को ध्यान में रखें कि पतंग को उड़ने के लिए पेड़ या अन्य कोई भी किसी भी तरह की रूकावट न हो, साथ ही आप हवा की दिशा में ही पतंग को उड़ाएं, ताकि आपकी पतंग को जरूरी हवा मिलती रहे। जैसे ही वो उड़नची दे… तुरन्त मांझे को दो चार हाथ खिंचें… पतंग उड़ने लगेगी।
पतंग को हवा में बनाए रखने के लिए अंगूठे और उंगली के मध्य पकड़े धागे को कोहनी के जोड़ के दम पर कलाई से धागे को जर्क दिया जाता है, जिससे पतंग ऊपर चढ़ती है और इधर-उधर भटकने से बचती है। ढील दें, ठुनकी दें और अपनी पतंग को ऊपर उठते हुए देखते हुए पतंग उड़ाने का आनंद लें।
पेंच दो तरह से लड़ाए जाते हैं… डोर खींचकर या ढील देकर। डोर खींचकर पेंच लड़ाना चाहते हैं तो आपकी पतंग विरोधी पतंग से नीचे होनी चाहिए। अगर ढील देकर पेंच लड़ाना चाहते हैं तो ध्यान रखें कि डोर को धीरे-धीरे छोड़ें। इस दौरान पतंग को गोल-गोल घुमाते रहेंगे तो जीतने की संभावना ज्यादा रहेगी। पेंच लड़ाते समय ठुनकी देते हुए मांझा टकराएं। जैसे ही आपको लगे कि आपकी ठुनकी से आपके पतंग ने जोर पकड़ा है… रप्प से ढील दें और विरोधी के मांझे पर रिग्गे पटककर काट दें और गर्व से चिल्लाएं का …. ट …..टा …..है…!

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